भारतीय प्रशासन
विषय सूची
- प्रस्तावना
- प्राचीन काल की शासन व्यवस्था
- भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था
- भारतीय प्रशासनिक प्रणाली के कार्य
- भारतीय प्रशासन व्यवस्था की विशेषताएं
प्रस्तावना
बैंकिंग, एसएससी, बीमा आदि जैसी विभिन्न सरकारी भर्ती परीक्षाओं के लिए सामान्य जागरूकता की तैयारी की बात आती है तो भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था (Indian Administrative System in Hindi) अध्ययन का एक महत्वपूर्ण विषय है! भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था (Indian Administrative System in Hindi) के बारे में जानना सिर्फ अध्ययन सामग्री के रूप में ही आवश्यक नहीं है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि आपको दैनिक जीवन में इसके बारे में जानकारी हो। इस लेख में, आप इस व्यापक स्टेटिक जीके के तहत भारतीय प्रशासन के विकास और इतिहास, भूमिकाओं और कार्यों, संगठनात्मक संरचना और भारतीय प्रशासन प्रणाली के मुद्दों के बारे में जानेंगे। उम्मीदवारों को इस पाठ से भारतीय प्रशासनिक प्रणाली और भारतीय प्रशासन में विभाजन प्रणाली के बारे में जो कुछ भी सीखा है, उसे नोट करना चाहिए।
प्राचीन काल की शासन व्यवस्था
प्राचीन काल में विभिन्न प्रकार के प्रशासन प्रचलित रहे हैं। भारतीय प्रशासन का प्रारम्भ सिन्धु घाटी से भी अधिक प्राचीन है तथा हमारी सिन्धु-घाटी सभ्यता काल के प्रशासन के विषय में हमारा ज्ञान अधिकतर अनुमानों और कल्पनाओं पर आधारित है। खुदाई में प्राप्त अवशेषों से विद्वानों ने निष्कर्ष निकाला है कि मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के साम्राज्य व्यवस्थित थे। पुरोहित लोग शासन करते थे जो सुमेर और अकात के पुरोहित राजाओं के समान थे। राज्य का स्वरूप केन्द्रीकृत था और नगरपालिका शासन से लोग अपरिचित थे। हण्टर नामक विद्वान के अनुसार काल की शासन व्यवस्था लोकतांत्रात्मक थी।
ऋग्वैदिक काल
इस काल में भारतीय प्रशासन का स्वरूप राजतन्त्रात्मक था। राज्य और राजा को जन-कल्याण-साधक माना जाता था। प्रजा-धर्म के विरूद्ध कार्य करने वाले राजा और पदाधिकारी पदच्युत किए जा सकते थे। राजा अपने विभिन्न मंत्रियों के परामर्श से शासन चलाता था। मंत्रियों में सबसे प्रमुख स्थान पुरोहित का था। राजदरबार में गाँव और निवासियों का प्रतिनिधित्व ‘ग्रामीण‘ नामक पदाधिकारी द्वारा किया जाता था। सभा ओर समिति नामक जन-संस्थाएँ भी विद्यमान थीं। समिति सम्पूर्ण प्रजा की संस्था थी जो राजा का निर्वाचन करती थी। सभा समिति से छोटी संस्था थी जिसकी सहायता से राजा दैनिक राज्य-कार्य करता था। इस संस्था के माध्यम से ही वह अभियोगों का नियंत्राण करता था। इन दोनों संस्थाओं का राजा के ऊपर नियंत्राण था जो आगे चलकर शिथिल हो गया।
उत्तर-वैदिक काल
इस काल में राजा का पद पैतृक अथवा वंशानुगत हो गया। इस काल में राजा बहुत कुछ स्वच्छद होते हए भी निरंकुश नहीं था। इस काल में राजा के निर्वाचन का सिद्धान्त समाप्त नहीं हुआ था और उसके उत्तराधिकारी पर राष्ट्र के प्रमुख व्यक्तियों का प्रभाव और नियंत्राण रहता था। शासन के संचालन में राजा प्रतिष्ठित मंत्रियों की एक परिषद् की सहायता लेता था प्रधानमंत्राी को मुख्यामात्य कहा जाता था। सभा, समिति और मन्त्रिा-परिषद् का राजा पर प्रभाव था। राज्य की शासन व्यवस्थ को सुविधाजनक बनाने के लिए अनेक विभागों की रचना की गई थी, जैसे- वित्त विभाग, निरीक्षण विभाग, संरक्षण विभाग और सेना विभाग। स्थानीय शासन का कार्यभार एक विशेष मन्त्राी द्वारा वाहन किया जाता था। उसका मुख्य कार्य ग्राम और विषय के अधिकारियों पर नियंत्राण रखना और उनके पारस्परिक झगड़ों का निपटारा करना था। न्याय व्यवस्था का सर्वोच्च अधिकारी राजा होता था तथा उसकी सहायता के लिए अन्य अधिकारी भी होते थे।
महाकाव्य काल
रामायण और महाभारत हमारे देश के अति प्राचीन महाकाव्य है। रामायणकालीन शासन का रूप राजतन्त्राीय था तथा प्रजा सुखी एवं समृद्ध थी। प्रशासन का अध्यक्ष राजा होता था जिसे परामर्श और राज्य-कार्यो के संचालन में सहायता देने के लिए मन्त्राी, सभासद आदि होते थे। राज्य का वास्तविक उद्देश्य धर्मपालन और सदाचार को प्रोत्साहन देना, प्रजा की सुख-समृद्धि को रामायण से यह स्पष्ट होता है कि प्रशासन कार्य में ‘मन्त्राणा‘ का विशेष महत्व और प्रचलन था। सभा या परिषद् महत्वपूर्ण संस्था थी और महत्वपूर्ण अवसरों पर नियन्त्राण के लिए आमन्त्रिात की जाती थी। सभा में अमात्य तथा चारों वर्णों के प्रतिनिधि सदस्य होते थे। रामायण से पता चलता है कि अमात्यों के अतिरिक्त और भी अनेक राज्याधिकारी होते थे। प्रशासन अनेक विभागों में विभाजित था। न्याय निष्पक्ष था।
महाभारत में राज्य को ‘सप्तांगी‘ कहा गया है। इस युग में राजतन्त्रा को ही प्रमुख शासनतन्त्रा माना गया है। राजा उच्च आदर्शों एवं कर्तव्यों का प्रतीक था। राजा का धर्म था कि वह मन, वचन और कर्म से न्याय करें, गरीबों पर अत्याचार न करें, अपराधी को दण्ड दे, प्रजा के कष्टों का निवारण करें, आदि। सामान्यतः राज्याधिकारी वंशानुगत होता था। महाभारत में शासन की अनिवार्यता को स्पष्टतः घोषित किया गया है। शासन ही राजा को सुरक्षित रखता है और राज्य में शान्ति एवं व्यवस्था स्थापित करता है। शासन के संगठन की दृष्टि से महाभारत में दो बातों का मुख्य रूप से विवेचन है- शासन के अधिकारियों और कर्मचारियों का तथा उनकी योग्यताओं का। शासन का अध्यक्ष राजा होता था। उसके परामर्श के लिए अन्य मन्त्रिागत थे। मन्त्रिायों के अतिरिक्त उच्चाधिकारी भी होते थे। महाभारत-काल में विधि, दण्ड और न्याय का पर्याप्त महत्व था। संक्षेप में, रामायण तथा महाभारत-काल में प्रशासन का विस्तृत वर्णन देखने को मिलता है। महाकाव्य-काल में कुछ गणतन्त्रों का अस्तित्व था परन्तु प्रमुखतः राजतन्त्रा ही विद्यमान थे। राजा सर्वोच्च अधिकारी होता था तथा लोक-कल्याण के कार्य व प्रजा की रक्षा करना उसके प्रमुख कर्तव्य थे। सम्राट को प्रशासन में सहायता देने के लिए दो संस्थाएँ मन्त्रिापरिषद् व सभी होती थीं। प्रशासन की सुविधा के लिए सम्पूर्ण साम्राज्य को विभिन्न इकाइयों में विभाजित किया गया था। सबसे छोटी इकाई ‘ग्राम‘ थी। बौद्ध-साहित्य में महात्मा बुद्ध के आविर्भाव से पूर्व एवं उनके समय में ‘महाजन‘ पदों के अस्तित्व का पता चलता है। महात्मा बुद्ध के समय अनेक गणतन्त्रात्मक राज्य थे किन्तु चार राजतन्त्रा भी थे- मगध, अवन्ति, वत्स और कौशल। बौद्ध-साहित्य में बौद्धकालीन गणतन्त्रों का वर्णन है। बौद्धकालीन गणराज्यों में प्रशासन की वास्तविक शक्ति ‘सभा‘ में निहित थी जो ‘सभागार‘ में होती थी तथा छोटे-बड़े समान रूप से उसके सदस्य होते थे। राज्य का एक अध्यक्ष होता था जिसे राजा कहते थे जिसे चुनाव के द्वारा एक निश्चित समय के लिए नियुक्त किया जाता था। इस प्रकार बुद्ध के युग में राज्यों पर वंशानुगत राजा बल्कि गणसभाओं के प्रति उत्तरदायी व्यक्ति शासन करते थे।
मौर्य प्रशासन
मौर्य प्रशासन में राजा ही साम्राज्य का प्रमुख होता था और कार्यकारी, न्यायिक एवं विधायी शक्तियाँ सब उसी में निहित थीं। इस काल में चन्द्रगुप्त मौर्य ;322 ईसा पूर्व – 298 ईसा पूर्वद्ध एक कुशल सेनानायक और विजेता होने के साथ ही एक उच्चकोटि का शासक भी था। चन्द्रगुप्त के शासन का स्वरूप प्रबुद्ध राजतंत्रा था। पूरी सत्ता राजा के अधीन थी, किन्तु राजा का लक्ष्य प्रजा का अधिक से अधिक जनकल्याण करना था। प्रजा के कल्याण में राजा अपना हित समझा था। राजा की आज्ञा अथवा आदेशों को सर्वोच्च माना जाता था। राजा अकेला राज्य नहीं सम्भाल सकता था। अतः उसकी सहायता के लिए मंत्रि-परिषद् तथा सुनियोजित
न्यायाधीश, ;पपपद्ध सेनापति एवं ;पअद्ध कोषाध्यक्ष का उल्लेख किया है। कौटिल्य (चाणक्य) ने राज्याधिकारियों का विस्तृत रूप से उल्लेख किया है। उसके अर्थशास्त्रा में 18 तीर्थों (उच्चअधिकारियों) का उल्लेख है-
;1द्ध मंत्राी-राजा का सर्वोच्च परामर्शदाता;
;2द्ध पुरोहित-यह भी राजा के राज्य-कार्यो तथा धार्मिक कार्यो में परामर्श देता था;
;3द्ध सेनापति-सेना का अध्यक्ष;
;4द्ध युवराज-राजा का उत्तराधिकारी तथा परामर्शदाता;
;5द्ध दौवारिक-मुख्य स्वागत अधिकारी तथा द्वार-रक्षक;
;6द्ध अन्तर्वेशिक-अन्तपुरः का रक्षक;
;7द्ध प्रशस्ति (राष्ट्रपाल)- पुलिस का सर्वोच्च अधिकारी;
;8द्ध समाहर्ता-आय संग्राहक;
;9द्ध सन्निधाता-कोषाध्यक्ष;
;10द्ध प्रदेष्टा-क्षेत्राीय अधिकारी अथवा दण्डनायक;
;11द्ध नायक-पैदल सेना का मुख्य अधिकारी अथवा नगरी कोतवाल;
;12द्ध व्यावहारिक-न्यायाधीश;
;13द्ध नगर निरीक्षक-स्थानीय निकायों का अधिकारी;
;14द्ध व्यापाराध्यक्ष-उद्योग तथा व्यापार का अधीक्षक;
;15द्ध अन्तपाल-सीमा सुरक्षा सम्बन्धी अधिकारी;
;16द्ध कर्मान्तक-खानों का अध्यक्ष
;17द्ध महापौर-नगर का सर्वोच्च अधिकारी और
;18द्ध आटविक-वन विभाग का अध्यक्ष।
इनमें से उपर्युक्त प्रथम चार अधिकारी मंत्रिमण्डल के अन्तरंग सदस्य थे जिनसे राजा महत्वपूर्ण विषयों पर परामर्श लेता था और अन्य 14 विभागाध्यक्ष थे, इनसे भी राजा समय≤ पर परामर्श लेता था। इन सभी को उच्च वेतन दिये जाते थे। सम्पूर्ण राज्य प्रान्तों में विभक्त था। क्षेत्रा का मुख्य अधिकारी प्रवेष्टा कहलाता था। वह सामान्य प्रशासन, कर-वसूली तथा शान्ति एवं सुरक्षा की देखभाल करता था। उसको दण्डनायक के अधिकार भी प्राप्त थे। क्षेत्रा ग्रामों में विभक्त थे। ग्राम का अधिकारी ‘गोप‘ होता था। 10 ग्रामों का संग्राहक तथा 200 ग्रामों का एक ‘खार्वटिक‘ होता था, 400 ग्रामों का अधिकारी ‘द्रोणमुख‘ कहलाता था तथा 800 ग्रामों पर एक ‘स्थानीय‘ होता था।
गुप्तकालीन प्रशासन
गुप्त-राजाओं ने अपने पूर्व-प्रशासकों के शासन-प्रबन्ध को अपनाते हुए उसमें कुछ आवश्यक परिवर्तन कर समय के अनुकूल बनाया। इस अवधि में राजतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली प्रचलित थी। राजा को प्रशासनिक कार्यों में सहायता देने के लिए एक मन्त्रिापरिषद् होती थी। सम्पूर्ण केन्द्रीय शासन अनेक विभागों में संगठित था जिसका प्रबन्ध मन्त्राी, अमात्य कुमारामात्य, आदि अधिकारी करते थे। देश में आन्तरिक शान्ति एवं सुरक्षा के लिए पुलिस-विभाग था। इस विभाग का सर्वोच्च अधिकारी ‘दण्डपाशिक‘ होता था। शासन की सुविधा के लिए गुप्त-साम्राज्य अनेक इकाइयों में बँटा हुआ था। सबसे बड़ा विभाग प्रान्त था, जिसको देश या ‘भक्ति‘ कहते थे। प्रान्तीय शासक ‘भोगपति‘ कहलाते थे। प्रान्तों के बाद ‘क्षेत्रा प्रदेश‘ आता था जो आज की कमिशनरी के बराबर होता था और इससे छोटा विभाग ‘विषय‘ कहलाता था जो जिले के समकक्ष होता था। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ‘ग्राम‘ था जिसका अधिकारी ‘ग्रामिक‘ होता था। ग्रामिक की सहायता के लिए एक समिति होती थी जिसे ‘ग्रामसभा‘ कहते थे। संक्षेप में, गुप्त-शासकों की प्रशासनिक व्यवस्था उच्चकोटि की थी और उन्होंने अपने विशाल साम्राज्य का सुचारू रूप से शासन किया। डाॅ॰ अल्तेकर ने गुप्त-प्रशासन की प्रशंसा करते हुए लिखा है, “गुप्तकालीन शासन-प्रणाली तथा उसकी उपलब्धियों के विषय में हमारे पास विस्तृत सामग्री है जिसके आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वह केन्द्र व प्रान्त दोनों में अत्यन्त सुव्यवस्थित थी।”
राजपूतकालीन प्रशासन
राजपूत काल में गणतन्त्रों के समाप्त होने से राजतन्त्रात्मक शासन-व्यवस्था का बोलबाला था। राजपद वंशानुगत होता था। राजा को परामर्श देने के लिए मंत्रिमण्डल की व्यवस्था थी। मन्त्राी अपने-अपने विभागों का प्रबन्ध करते थे। मन्त्राी पद भी वंशानुगत हो चले थे। केन्द्रीय शासन सुगठित नहीं था क्योंकि प्रान्तीय शासन पर उन सामन्तों का ही अधिकार होता था जो प्रायः स्वतंत्रा रूप से शासन करते थे। जागीर-प्रथा के प्रचलन से सामन्तों के अधिकारों में भारी वृद्धि हुई। प्रायः युवराज और राजकुल के व्यक्तियों को ही प्रान्तीय शासक बनाया जाता था। प्रान्तीय शासन अनेक विभागों में विभक्त होता था। प्रत्येक विभाग का एक अधिकारी होता था जिसके अधीन बहुत से कर्मचारी होते थे। ग्राम पंचायतों पर सामन्तों का अधिकारी होने से उनका महत्व कम हो गया था। साम्राज्य प्रान्तों, जिलों, अधिष्ठानों और ग्रामों में विभक्त था। इस प्रकार ये शासन-पद्धति गुप्तकालीन शासन पद्धति के आधार पर विकसित हुई थी।
ब्रिटिश प्रशासन
वर्तमान भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था का निष्पक्ष अध्ययन किया जाए तो प्रतीत होगा कि यह अधिकांशतः भारत में ब्रिटिश शासन की विरासत है। भारत मंे सन् 1858 तक ब्रिटिश प्रशासन मुख्य रूप से ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधीन रहा। यद्यपि ब्रिटिश सरकार समय≤ पर अधिनियम पास करके हस्तक्षेप करती तथा कम्पनी के शासन पर नियंत्राण रखती थी। सम्राट ने 1858 में कम्पनी को पूर्णतः अपने अधिकार में ले लिया। यद्यपि प्रारंभ में कम्पनी का कार्य विशुद्धतः व्यावसायिक था लेकिन इसने धीरे-धीरे सरकार या शासक निकाय का दर्जा प्राप्त कर लिया। जब अंग्रेजों ने सन् 1600 से व्यापारिक कार्य शुरू किए, पुर्तगाली, डच और फ्रांसीसी जैसी विदेशी शक्तियां पहले से ही व्यापार में लगी हुई थी। इस प्रकार पूर्व के व्यापार पर अधिकार पाने के लिए अंग्रेजों को दूसरी यूरोपीय शक्तियों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ी। इसके बाद ही उन्होंने प्रादेशिक आधिपत्य प्राप्त करने की भी चेष्टा की। मुगल साम्राज्य के समाप्त होने और राजाओं और नवाबों के बीच विध्वंसात्मक लड़ाइयों के कारण ऐसा सम्भव हो सका। उदाहरण के लिए कर्नाटक युद्ध के बाद अंग्रेजों ने उत्तरी सरकारों पर कब्जा कर लिया जो इससे पहले फ्रांस के अधिकार में थी। सन् 1757 में प्लासी युद्ध जीतने के बाद और इलाहाबाद की संधि के द्वारा उन्होंने सन् 1765 में बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त कर ली। साथ ही उन्हें इन प्रांतों पर प्रशासन और राजस्व की वसूली का अधिकार भी मिल गया। वस्तुतः सन् 1757 के प्लासी युद्ध और सन् 1857 के सैनिक विद्रोह के बीच, इन सौ वर्षो में अंगे्रजों ने पूरे भारत पर अधिकार कर लिया था और इस प्रकार शीघ्र ही भारत ब्रिटिश राजमुकुट में एक बहुमूल्य हीरे के रूप में सुशोभित हो गया। सुविधानुसार ब्रिटिश कालीन भारतीय प्रशासन के विकास को निम्नलिखित कालों में आबंटित किया जा सकता है।
ब्रिटिश काल की भारतीय प्रशासन को विरासत वर्तमान भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था ब्रिटिश शासन की विरासत मानी जाती है क्योंकि सन् 1947 में सत्ता हस्तान्तरण के समय हमने ब्रिटिश प्रशासनिक ठाचे को यथावत स्वीकार किया था जिसमें बहुत कम संशोधन या परिवर्तन किए गए हैं। ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा ब्रिटिश कानूनों से नियंत्रित भारतीय प्रशासन लगभग 200 वर्ष तक निरन्तर विकसित तथा परिवर्तित किया जाता रहा। इस दौरान जो प्रक्रियाएँ या परम्पराएँ विकसित हुई उनका प्रभाव आज भी भारतीय प्रशासनिक तंत्रा पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जो निम्नानुसार हैं
1 भारतीय लोक सेवाएँः- ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत में प्रशासन संचालित करने के लिए ‘इण्डियन सिविल सर्विस‘, इण्डिया पुलिस‘ तथा अन्य अखिल भारतीय लोक सेवाओं की शुरूआत की गई थी। इन सेवाओं के अधिकारी भारत में कहीं भी नियुक्त किए जा सकते हैं। प्राधिकार की दृष्टि से भी ये अधिकारी अधिक सुदृूठा, गँवार तथा जटिल व्यक्ति कहकर प्रताड़ित करते थे अतः प्रत्येक प्रशासनिक कार्य में लम्बे चैड़े फार्म, शपथपत्रा, चरित्रा प्रमाणपत्रा, राजपत्रित अधिकारी ;ळं्रमजजमक व्ििपबमतद्ध से प्रमाण पत्रा लेने इत्यादि की प्रक्रियाएँ निर्धारित की गई थी जो आज भी भारतीय लोक प्रशासन में यथावत जारी हैं। लोक सेवकों में जनता से श्रेष्ठ, पृथक् तथा स्वामी समझने की प्रवृत्ति अंग्रेजी प्रशासन का परिणाम कही जाती है। स्वतंत्रा भारत में इस गुलाम मानसिकता के अतिरिक्त नौकरशाही में अन्य कई दोष विद्यमान हैं। ‘साहब संस्कृति‘ तथा ‘बाबूराज‘ की शुरूआत भी ब्रिटिश प्रशासन की ही देन है जो आज सम्पूर्ण भारतीय प्रशासन की विशिष्ट पहचान बन चुकी है।
सचिवालय व्यवस्थाः- सचिवालय वह उच्च प्रशासनिक संगठन है जिसमें राजनीतिक मंत्राी या सचिव (विभाग का प्रशासनिक अधिकारी) तथा उसके अन्य कार्मिक पदस्थापित रहते हैं। सचिव$आलय अर्थात् सचिवों का घर, नामक यह व्यवस्था संघीय स्तर पर केन्द्रीय सचिवालय तथा राज्यों में राज्य सचिवालय के रूप में प्रवर्तित है। अंग्रेजी शासन काल में विकसित सचिवालय आज भी नीति, कानून तथा कार्यक्रम निर्माण एवं नियंत्राण का महत्वपूर्ण अंग है जो मुख्यतः मंत्रियों को उनके कार्यो में परामर्श देने के लिए बनाया गया है। सचिवालय द्वारा निर्मित निति एवं कानूनों को व्यावहारिक स्तर पर क्रियान्वित करने हेतू अन्य कई प्रकार के कार्यकारी संगठन जैसे- निदेशालय, बोर्ड, आयोग तथा निगम इत्यादि संगठित किए गए ळें
कठोर नौकरशाहीः- प्रशासनिक कृत्यों की पूर्ति हेतू कानूनों, नियमों तथा प्रक्रियाओं की कठोर कार्यप्रणाली और ‘फाईल व्यवस्था” की शुरूआत ब्रिटिशकाल में हुई। चूँकि अंग्रेज अधिकारी आम भारतीय को झूठा, गँवार तथा जटिल व्यक्ति कहकर प्रताड़ित करते थे अतः प्रत्येक प्रशासनिक कार्य में लम्बे चैड़े फार्म, शपथपत्रा, चरित्रा प्रमाणपत्रा, राजपत्रित अधिकारी ;ळं्रमजजमक व्ििपबमतद्ध से प्रमाण पत्रा लेने इत्यादि की प्रक्रियाएँ निर्धारित की गई थी जो आज भी भारतीय लोक प्रशासन में यथावत जारी हैं। लोक सेवकों में जनता से श्रेष्ठ, पृथक् तथा स्वामी समझने की प्रवृत्ति अंग्रेजी प्रशासन का परिणाम कही जाती है। स्वतंत्रा भारत में इस गुलाम मानसिकता के अतिरिक्त नौकरशाही में अन्य कई दोष विद्यमान हैं। ‘साहब संस्कृति‘ तथा ‘बाबूराज‘ की शुरूआत भी ब्रिटिश प्रशासन की ही देन है जो आज सम्पूर्ण भारतीय प्रशासन की विशिष्ट पहचान बन चुकी है।
पुलिस प्रशासनः- अंग्रेजों द्वारा भारत पर शासन के दो मुख्य उद्देश्य थे। प्रथमतः भारत में राजस्व एवं कच्चा माल संग्रहित कर इंग्लैण्ड भेजना तथा दूसरा भारत पर शासन करने के लिए शांति-व्यवस्था बनाए रखना। अतः 1808 में पुलिस अधीक्षक का पद सृजित किया गया। सन् 1860 के पुलिस आयोग की अनुशंसा पर ‘पुलिस अधिनियम 1861‘ पारित हुआ। सेना एवं पुलिस के कार्यो को पृथक् करते हुए पुलिस अधीक्षक को जिला कलक्टर के अधीन पदस्थापित कर पुलिस महानिरीक्षक ;प्ण्ळण्च्द्ध का उच्च पद सृजित किया गया। वर्तमान भारतीय पुलिस तंत्रा, कार्यप्रणाली तथा संगठनात्मक व्यवस्था इसी अधिनियम पर आधारित है जो न्याय प्रशासन से भी जुड़ा हुआ है।
वित्त प्रशासनः- आय तथा व्यय के वार्षिक लेखे जोखे को बजट कहा जाता है। भारत में बजट या वित्तीय वर्ष की अवधि 1 अप्रैल से 31 मार्च तक निश्चित की जाती है। बजट निर्माण की प्रक्रिया, सरकारी लेखों का संधारण, बजट की स्वीकृति तथा निष्पादन एवं अंकेक्षण की प्रक्रियाएँ ब्रिटिश परम्पराओं पर आधारित है। सन् 1833 के अधिनियम के द्वारा गवर्नर जनरल को प्रान्तों की लोक सेवाओं के पदों, वेतन, भत्तों इत्यादि की स्वीकृति के लिए अधिकृत किया गया था, साथ ही प्रान्तों द्वारा एकत्रा राजस्व भी संघ सरकार की निधि होता था। लाॅर्ड मेयो द्वारा सन् 1870 में जेल, पुलिस, चिकित्सा, मुद्रण तथा पंजीकरण इत्यादि कार्यो हेतू प्रान्तों को उनके द्वारा एकत्रित राजस्व को उपभोग में लाने तथा केन्द्रीय अनुदान देने की व्यवस्था शुरू की गई। इसी प्रकार सन् 1877 में स्टेªचे योजना के अन्तर्गत भूमिकर, चुंगी, स्टाम्प एवं स्टेशनरी इत्यादि प्रान्तों के पूर्ण अधिकार में हो गई। सन् 1882 में समस्त राजस्व का केन्द्रीय, प्रान्तीय तथा विभाजित तीन भागों में विभक्त किया गया। कालान्तर में सन् 1935 के अधिनियम के द्वारा प्रान्तों को स्वयत्तता प्राप्त हुई। सन् 1919 में राष्ट्रीय स्तर पर आॅडीटर जनरल तथा प्रान्तों में महालेखाकार पद सृजित किए ताकि वित्तीय लेखों पर नियंत्राण रखा जा सके।
स्वशासनः- भारत में संघीय तथा प्रान्तीय शासन व्यवस्था के अतिरिक्त स्थानीय स्वशासन अर्थात् नगरपालिकाओं तथा ग्राम पंचायतों द्वारा शासन संचालित करने का भी प्रावधान है। स्थानीय शासन की महत्ता को समझते हुए ब्रिटिश शासकों ने सन् 1864 में बम्बई तथा मद्रास प्रेसीडेन्सियों में पंचायतों को न्याय पंचायत का वैधानिक अधिकार प्रदान किया। 12 मई, 1882 को लाॅर्ड रिपन जो भारत में स्थानीय स्वशासन के जनक मान जाते हैं, ने ग्रामीण स्थानीय संस्थाओं में निर्वाचित प्रतिनिधियों की व्यवस्था की। सन् 1909 के ‘विकेन्द्रीयकरण आयोग‘ ने ग्राम, तहसील तथा जिला स्तर पर त्रिस्तरीय स्थानीय शासन की अनुशंसा की थी। सन् 1919 के अधिनियम के द्वारा स्थानीय शासन प्रान्तीय सरकारों का कार्यक्षेत्रा कर दिया गया। यद्यपि प्रथम नगर निगम सन् 1687 में मद्रास में तथा इसके पश्चात् सन् 1726 में कलकत्ता एवं बम्बई में स्थापित हो गए थे तथापि अन्य नगरों में नगरपालिकाओं की स्थापना लाॅर्ड रिपन की नीति के पश्चात् शुरू हुई। स्वतंत्राता के पश्चात् 2 अक्टूबर, 1959 से भारत में ग्रामीण स्थानीय स्वशासन के त्रिस्तरीय की व्यवस्था की थी।
भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था
- भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था एकात्मक विशेषताओं वाली संघीय संसदीय शासन व्यवस्था है।
- भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) भारत सरकार की अखिल भारतीय सेवाओं की प्रशासनिक शाखा है और इसे भारत की प्रमुख सिविल सेवा माना जाता है।
- आईएएस राष्ट्र की स्थायी नौकरशाही का हिस्सा है और राजनीतिक रूप से तटस्थ है] प्रशासनिक निरंतरता की गारंटी देता है।
- आईएएस को भारत के संविधान के भाग XIV और अखिल भारतीय सेवा अधिनियम, 1951 के अनुच्छेद 312(2) के तहत बनाया गया था।
भारतीय प्रशासनिक प्रणाली ने ब्रिटिश प्रशासनिक प्रणाली से संसदीय प्रणाली, न्यायिक प्रणाली और कानून के शासन जै
भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की संरचना

भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था (Indian Administrative System Hindi mein) एक जटिल और श्रेणीबद्ध संरचना है जो देश के शासन और प्रशासन के लिए जिम्मेदार है। यहां सिस्टम की संरचना और कार्यप्रणाली का अवलोकन दिया गया है:
- राष्ट्रपति: भारत के राष्ट्रपति राज्य का प्रमुख और सशस्त्र बलों का सर्वोच्च कमांडर होता है। राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है जिसमें संसद सदस्य और राज्य विधायक शामिल होते हैं।
- प्रधानमंत्री: प्रधानमंत्री सरकार का प्रमुख और सत्तारूढ़ दल या गठबंधन का नेता होता है। प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह सरकार के समग्र कामकाज के लिए जिम्मेदार होता है।
- मंत्रिपरिषद: मंत्रिपरिषद की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। मंत्रिपरिषद में कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री और उप मंत्री शामिल होते हैं जो विभिन्न सरकारी विभागों के प्रशासन के लिए जिम्मेदार होते हैं।
- भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस): आईएएस भारत की प्रमुख प्रशासनिक सेवा है और देश के विभिन्न सरकारी विभागों के प्रशासन के लिए जिम्मेदार है। आईएएस अधिकारियों की भर्ती संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से की जाती है और राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है।
- राज्य सरकारें: भारत में सरकार की एक संघीय प्रणाली है, और देश 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित है। प्रत्येक राज्य की अपनी सरकार होती है जिसका नेतृत्व एक मुख्यमंत्री करता है जो राज्य के प्रशासन के लिए जिम्मेदार होता है।
- जिला प्रशासन: प्रत्येक राज्य को जिलों में विभाजित किया गया है, और प्रत्येक जिले का नेतृत्व एक जिला कलेक्टर करता है जो जिले के प्रशासन के लिए जिम्मेदार होता है। जिला कलेक्टर को आईएएस और अन्य सेवाओं के विभिन्न अधिकारियों द्वारा सहायता प्रदान की जाती है।
- स्थानीय शासन: भारत में स्थानीय शासन गाँव, कस्बे और शहर स्तर पर निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है। स्थानीय सरकारी निकाय अपने-अपने क्षेत्रों के प्रशासन के लिए जिम्मेदार होते हैं और उनका नेतृत्व एक अध्यक्ष या महापौर करते हैं।
भारतीय प्रशासन व्यवस्था की विशेषताएं
भारतीय प्रशासनिक प्रणाली (Indian Administrative System in Hindi) एक जटिल और विविध प्रणाली है जो वर्षों से विकसित हुई है। यहां भारतीय प्रशासनिक प्रणाली की कुछ प्रमुख विशेषताएं दी गई हैं:
ऽ केन्द्रीय प्रशासन की प्रांतों के साथ कार्य क्षेत्रा में हिस्सेदारी में अरूचि, विचारधारा एवं योजना निर्माण एवं क्रियान्वन में अंसतुलन एवं मूल्यांकन का अभाव,
ऽ पदसोपान, पदस्थिति एवं वेतन की प्रधानता,
ऽ विदेशी विशेषज्ञों में विश्वास,
ऽ करनी की अपेक्षा कथनी में विश्वास,
ऽ समर्पित नौकरशाही का अभाव,
ऽ वृहद प्रशासन तंग,
ऽ प्रशासनिक सुधारों का दिखावा,
ऽ प्रशासन के भ्रष्टाचार।
फैरल हँड़ी ने विकासशील देशें के प्रशासक की कुछ विशेषताएं बताई हैं। जो निसंदेह भारतीय प्रशासन में भी विधमान हैं जैसे
1, विकासोन्मुख उद्देश्यों को प्रमुखता
2, सामाजिक विखण्डन, आर्थिक पिछड़ापन एवं राजनीतिक अस्थिरता
3, निर्वाचित प्रतिनिधियाँ के विचारों में भारी अन्तर (आधुनिक एवं परम्परागत के आधार पर)
4, अप्रशिक्षिता एवं अकुशल नौकरशाही
- पंचवर्षीय योजनाओं के उद्देश्यों की प्राप्ति के अनुमानों तथा कार्य निष्पादन में भारी अन्तराल पाँल एच॰ एप्पलबी ने भारतीय प्रशासन मंे एकता एवं विघटन के तत्वों पर प्रकाश डाला है। जैसे संवैधानिक लचीलापन, केन्द्र एवं राज्यों से संबंधित विवादों में केन्द्र की प्रमुखता, राज विधान पालिका कानून का केन्द्रीय कानून से विवाद की स्थिति में केन्द्र की निषेधाधिकार, आपातकाल में केन्द्र की प्रधानता आयकर व कष्टम डयूटी मंे केन्द्र की प्रधानता, ग्रांट एवं ऋण पर केन्द्र की प्रधानता, केन्द्र व राज्यों की सांझी लोकसेवा, केन्द्र द्वारा राज्यपाल की नियुक्ति, प्रधानमंत्राी में निहित राष्ट्रीय नेतृत्व। इसके अतिरिक्त भी अनेक विद्वानों भारतीय विशेषताओं का अध्ययन किया है जैसे के॰ अरोरा, सुरेन्द्र कटारिया, हरिश्चन्द्र शर्मा, पी॰ डी॰ शर्मा आदि । जिसके अनुसार भारतीय प्रशासन की कुछ प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैंः
भूतकाल की विरासत- भारतीय प्रशासन का आधुनिक रूप चाहे मुख्यतः ब्रिटिश उपनिवेशीय शासन ;ब्वसवदपंस त्नसमद्ध की देन है, परन्तु वास्तव में यह एक लम्बे ऐतिहासिक विकास का परिणाम है। वर्तमान भारतीय शासन काफी सीमा तक अपने प्राचीन तथा मध्यकालीन रूप से प्रभावित तथा एक क्रमिक विकास का परिणाम है। चूँकि भारत मंे सत्ता का हस्तान्तरण ब्रिटिश हाथों से भारत एवं पाकिस्तान नामक दो राष्ट्रों को किया गया था अतः स्वाभविक रूप से पूर्ववर्ती विशेषताएँ आज भी दृष्टव्य हैं। जिस प्रकार मुगलकालीन फारसी भाषा का आज भी राजस्व तथा न्याय प्रशासन में प्रभाव दिखाई पड़ता है उसी प्रकार अंग्रेजों द्वारा विकसित कानून, नियम, प्रक्रियाएँ भारतीय लोक प्रशासन में परिलक्षित होती हैं। अखिल भारतीय एवं अन्य लोक सेवाएँ, सचिवालयी व्यवस्थाएँ, नौकरशाही की कठोर कार्यप्रणाली, संघीय व्यवस्था एवं राष्ट्रीय एकता, प्रशासनिक अनामता तथा गोपनीयता, कमेटी प्रणाली, जिला प्रशासन, राजस्व प्रशासन, पुलिस प्रशासन, वित्त्ीय प्रशासन तथा स्थानीय प्रशासन इत्यादि ब्रिटिश शासन के मुख्य प्रभाव हैं जो आज भी भारतीय प्रशासन में दिखाई देते हैं।
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