विष्णु प्रभाकर का हिंदी साहित्य में योगदान
विषय सूची
- जीवन परिचय
- विष्णु प्रभाकर का हिंदी साहित्य में योगदान
- पुरस्कार और सम्मान
- प्रमुख कृतियाँ
जीवन परिचय
विष्णु प्रभाकर का जन्म उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के गांव मीरापुर में हुआ था। उनके पिता दुर्गा प्रसाद धार्मिक विचारों वाले व्यक्ति थे और उनकी माता महादेवी पढ़ी-लिखी महिला थीं जिन्होंने अपने समय में पर्दा प्रथा का विरोध किया था। उनकी पत्नी का नाम सुशीला था। विष्णु प्रभाकर की आरंभिक शिक्षा मीरापुर में हुई। बाद में वे अपने मामा के घर हिसार चले गये जो तब पंजाब प्रांत का हिस्सा था। घर की माली हालत ठीक नहीं होने के चलते वे आगे की पढ़ाई ठीक से नहीं कर पाए और गृहस्थी चलाने के लिए उन्हें सरकारी नौकरी करनी पड़ी। चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी के तौर पर काम करते समय उन्हें प्रतिमाह १८ रुपये मिलते थे, लेकिन मेधावी और लगनशील विष्णु ने पढाई जारी रखी और हिन्दी में प्रभाकर व हिन्दी भूषण की उपाधि के साथ ही संस्कृत में प्रज्ञा और अंग्रेजी में बी.ए की डिग्री प्राप्त की। विष्णु प्रभाकर पर महात्मा गाँधी के दर्शन और सिद्धांतों का गहरा असर पड़ा। इसके चलते ही उनका रुझान कांग्रेस की तरफ हुआ और स्वतंत्रता संग्राम के महासमर में उन्होंने अपनी लेखनी का भी एक उद्देश्य बना लिया, जो आजादी के लिए सतत संघर्षरत रही। अपने दौर के लेखकों में वे प्रेमचंद, यशपाल, जैनेंद्र और अज्ञेय जैसे महारथियों के सहयात्री रहे, लेकिन रचना के क्षेत्र में उनकी एक अलग पहचान रही।

विष्णु प्रभाकर ने पहला नाटक लिखा- हत्या के बाद, हिसार में नाटक मंडली में भी काम किया और बाद के दिनों में लेखन को ही अपनी जीविका बना लिया। आजादी के बाद वे नई दिल्ली आ गये और सितम्बर १९५५ में आकाशवाणी में नाट्य निर्देशक के तौर पर नियुक्त हो गये जहाँ उन्होंने १९५७ तक काम किया। वर्ष २००५ में वे तब सुर्खियों में आए जब राष्ट्रपति भवन में कथित दुर्व्यवाहर के विरोध स्वरूप उन्होंने पद्म भूषण की उपाधि लौटाने की घोषणा की। उनका आरंभिक नाम विष्णु दयाल था। एक संपादक ने उन्हें प्रभाकर का उपनाम रखने की सलाह दी। विष्णु प्रभाकर ने अपनी लेखनी से हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया। उन्होंने साहित्य की सभी विधाओं में अपनी लेखनी चलाई। १९३१ में हिन्दी मिलाप में पहली कहानी दीवाली के दिन छपने के साथ ही उनके लेखन का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज आठ दशकों तक निरंतर सक्रिय है। नाथूराम शर्मा प्रेम के कहने से वे शरत चन्द्र की जीवनी आवारा मसीहा लिखने के लिए प्रेरित हुए जिसके लिए वे शरत को जानने के लगभग सभी सभी स्रोतों, जगहों तक गए, बांग्ला भी सीखी और जब यह जीवनी छपी तो साहित्य में विष्णु जी की धूम मच गयी। कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, संस्मरण, बाल साहित्य सभी विधाओं में प्रचुर साहित्य लिखने के बावजूद आवारा मसीहा उनकी पहचान का पर्याय बन गयी। बाद में अर्द्धनारीश्वर पर उन्हें बेशक साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला हो, किन्तु आवारा मसीहा ने साहित्य में उनका मुकाम अलग ही रखा।
विष्णु प्रभाकर ने अपनी वसीयत में अपने संपूर्ण अंगदान करने की इच्छा व्यक्त की थी। इसीलिए उनका अंतिम संस्कार नहीं किया गया, बल्कि उनके पार्थिव शरीर को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को सौंप दिया गया। वे सीने और मूत्र में संक्रमण तथा न्युमोनिया के कारण २३ मार्च २००९ से महाराजा अग्रसेन अस्पताल में भर्ती थे। उन्होंने २० मार्च से खाना-पीना छोड़ दिया था। उनके परिवार में दो बेटे और दो बेटियाँ हैं।
| नाम | विष्णु प्रभाकर (Vishnu Prabhakar) |
| जन्म | 21, जून, 1912 |
| जन्म स्थान | मीरापुर गाँव, मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश |
| पिता का नाम | श्री दुर्गा प्रसाद |
| माता का नाम | श्रीमती महादेवी |
| शिक्षा | बी.ए (अंग्रेजी), पंजाब विश्वविद्यालय |
| पेशा | लेखक, नाटककार, सरकारी सेवा में कई पदों पर कार्यरत |
| भाषा | हिंदी |
| साहित्य काल | आधुनिक काल |
| विधाएँ | कहानी, नाटक, उपन्यास, यात्रा वृतांत, रेखाचित्र, संस्मरण, निबंध, अनुवाद और बाल साहित्य। |
| उपन्यास | ‘अर्धनारीश्वर’, ‘स्वपनमय’, ‘तट का बंधन’, ‘परछाई’ आदि। |
| कहानी-संग्रह | ‘धरती अब भी घूम रही है’, ‘संघर्ष के बाद’, ‘एक कहानी का जन्म’, ‘रहमान का बेटा’ आदि। |
| नाटक | युग-युग क्रांति, सीमा रेखा, हत्या के बाद, समाधि आदि। |
| जीवनी | ‘आवारा मसीहा’, ‘अमर शहीद भगत सिंह’, ‘सरदार वल्लभभाई पटेल’ आदि। |
| बाल-साहित्य | ‘रामू की होली’, ‘दादा की कचहरी’, ‘मोटे लाल’, ‘कुंती के बेटे’ आदि। |
| पुरस्कार एवं सम्मान | ‘पद्म भूषण’, ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’, ‘सोवियत नेहरू लैंड पुरस्कार’, ‘शलाका सम्मान’ आदि। |
| निधन | 19, अप्रैल, 2009 |
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में हुआ जन्म
प्रतिष्ठित साहित्यकार विष्णु प्रभाकर (Vishnu Prabhakar) का जन्म 21, जून, 1912 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के मीरापुर गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम ‘श्री दुर्गा प्रसाद’ और माता का नाम ‘श्रीमती महादेवी’ था। क्या आप जानते हैं कि विष्णु प्रभाकर का आरंभिक नाम ‘विष्णु दयाल’ था। किंतु साहित्य जगत में वह विष्णु प्रभाकर के नाम से जाने गए।
पंजाब विश्वविद्यालय से किया बी.ए
विष्णु प्रभाकर की प्रारंभिक शिक्षा मीरपुर में हुई, किंतु गांव में उच्च शिक्षा का उचित प्रबंध न होने के कारण उनकी माता ने उन्हें मामा के पास ‘हिसार’ (जो पहले पंजाब और अब हरियाणा में) भेज दिया। यहाँ उन्होंने आर्यसमाजी विद्यालय में दाखिला लिया लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वह आगे की पढ़ाई ठीक ढंग से नहीं कर पाए।
इसलिए उन्हें जीवन यापन करने के लिए डी ग्रुप की सरकारी नौकरी करनी पड़ी। बता दें कि इस नौकरी से उन्हें प्रतिमाह 18 रुपये मिलते थे। विष्णु प्रभाकर ने अपने कठिन परिश्रम और लगनशीलता के बल पर हिंदी में ‘प्रभाकर’, संस्कृत में ‘प्रज्ञा’ और ‘पंजाब विश्वविद्यालय’ से अंग्रेजी में बी.ए की डिग्री हासिल की।
स्वतंत्रता आंदोलन का रहे हिस्सा
ये वो दौर था जब संपूर्ण भारत में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आंदोलन हो रहे थे। इस स्वतंत्रता संग्राम में विष्णु प्रभाकर ने भी भाग लिया और अपनी रचनाओं में माध्यम से आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। वहीं राजनितिक गतिविधियों से जुड़े रहने के कारण उन्हें कई बार जेल की यात्रा भी करनी पड़ी थी। इसके बाद शासनादेश के कारण उन्होंने पंजाब छोड़ दिया और दिल्ली आकर संयुक्त परिवार के साथ रहने लगे।
क्या आप जानते हैं कि विष्णु प्रभाकर पर ‘महात्मा गांधी’ के विचारों और सिद्धांतों का बहुत असर था। वहीं उन्होंने जीवन पर खादी पहनने का संकल्प लिया और जीवन के अंतिम समय तक निभाया भी।
विस्तृत रहा कार्य क्षेत्र
विष्णु प्रभाकर ने हिसार में अपनी नौकरी के दौरान नाटक मंडली में भी काम किया। वहीं, दिल्ली आने के बाद उन्होंने लगभग दो वर्षों तक ‘अखिल भारतीय आयुर्वेद महामंडल’ में लेखाकार के रूप में भी कार्य किया। किंतु यहाँ से त्यागपत्र देने के बाद वह स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य करने लगे। इसके साथ ही वह अखिल राष्ट्रीय कांग्रेस से भी जुड़े रहे।
वर्ष 1955 में उन्होंने भारत सरकार के आमंत्रण पर आकाशवाणी के ‘दिल्ली केंद्र’ पर नाटक निर्देशक के पद पर कार्य किया। यहाँ उन्होंने वर्ष 1957 तक कार्य किया और फिर स्वतंत्र लेखन कार्य में जुट गए।
विष्णु प्रभाकर हिंदी के यशस्वी साहित्यकार हैं, जिन्होंने साहित्य के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया. वे मानो सिर से पैर तक साहिविष्णु प्रभाकर हिंदी के यशस्वी साहित्यकार हैं, जिन्होंने साहित्य के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया. वे मानो सिर से पैर तक साहित्यकार हैं जिनका ओढ़…
वैवाहिक जीवन
विष्णु प्रभाकर का विवाह 30, मई 1938 को ‘सुश्री सुशीलादेवी’ से हुआ। बता दें कि विवाह के समय विष्णु जी की आयु 26 वर्ष की थी। अपने दांपत्य जीवन में उन्होंने चार संतानों को जन्म दिया। वहीं कैंसर जैसी घातक बीमारी के कारण उनका 08 जनवरी 1990 को 60 वर्ष की आयु में देहांत हो गया।
कालजयी रचना ‘आवारा मसीहा’ से मिली विशेष प्रसिद्धि
विष्णु प्रभाकर की कालजयी रचना आवारा मसीहा बंगला भाषा के विख्यात रचनाकार ‘शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय’ के जीवन पर आधरित जीवनी थी। क्या आप जानते हैं कि इस रचना के लिए उन्होंने अपने जीवन के 14 वर्ष लगाए थे। इसके साथ ही उन्होंने बांग्ला भाषा सीखकर शरदचंद्र चट्टोपाध्याय के समय के सैकड़ों समकालीन लोगों से बात की व बिहार, बंगाल और बर्मा (वर्तमान म्यांमार) का व्यापक भ्रमण किया।
इस रचना के कारण वह अखिल भारतीय रचनाकार के रूप में विख्यात हुए। इस कृति के बारे में वे स्वयं कहते हैं कि – “चौदह वर्ष जीया था मैं उस आवारा मसीहा के साथ जिसे मैंने कभी देखा नहीं था।”
पुरस्कार और सम्मान
विष्णु प्रभाकर ने किशोरावस्था से ही साहित्य का सृजन किया था। वहीं उनकी पहली कहानी ‘दिवाली की रात’ वर्ष 1931 में लाहौर से प्रकाशित होने वाले समाचारपत्र ‘मिलाप’ में छपी थी। उस समय उनकी आयु मात्र उन्नीस वर्ष की थी और यह साहित्यिक यात्रा छियत्तर वर्ष की आयु तक निरंतर जारी रही।
विष्णु प्रभाकर (Vishnu Prabhakar Biography in Hindi) ने आधुनिक हिंदी साहित्य की कई विधाओं में साहित्य का सृजन किया। इनमें मुख्य रूप से उपन्यास, कहानी, कविता, यात्रा वृतांत, नाटक, निबंध, अनुवाद, संस्मरण और बाल साहित्य विधाएँ शामिल हैं। यहाँ विष्णु प्रभाकर की संपूर्ण साहित्यिक रचनाओं के बारे में विस्तार से बताया गया है, जो कि इस प्रकार हैं:-
उपन्यास
- ढलती रात – वर्ष 1951
- निशिकांत – वर्ष 1955
- तट के बंधन – वर्ष 1955
- स्वप्नमयी – वर्ष 1956
- दर्पण का व्यक्ति – वर्ष 1968
- परछाई – वर्ष 1968
- कोई तो – वर्ष 1987
कहानी-संग्रह
- आदि और अंत – वर्ष 1945
- रहमान का बेटा – वर्ष 1947
- जिंदगी के थपेड़े – वर्ष 1952
- संघर्ष के बाद – वर्ष 1953
- धरती अब भी घूम रही है – वर्ष 1959
- सफर के साथी – वर्ष 1960
- खंडित पूजा – वर्ष 1960
- साँचे और कला – वर्ष 1962
- मेरी प्रिय कहानियाँ – वर्ष 1972
- मेरी तैतीस कहानियाँ – वर्ष 1981
- पुल टूटने से पहले – वर्ष 1977
- मेरा वतन – वर्ष 1980
- खिलौने – वर्ष 1981
- इक्यावन कहानियां – वर्ष 1983
- मेरी कहानियाँ – वर्ष 1983
- मेरी कथा यात्रा – वर्ष 1984
- एक और कुंती – वर्ष 1985
- जिंदगी के रिहर्सल – वर्ष 1986
- एक आसमान के नीचे – वर्ष 1989
नाटक
इनके प्रसिद्ध नाटक हैं-
(1)डॉक्टर
(2)बिंदी
(3)अब और नहीं
(4)सत्ता के आर-पार
(5)गांधार की भिक्षुणी
(6) नवप्रभात
(7)केरल का क्रांतिकारी
(8)टूटते परिवेश
(9)युगे युगे क्रांति
(10) श्वेत कमल
(1) डॉक्टर :-इनका प्रसिद्ध नाटक है। पति द्वारा परित्यक्ता पत्नी की क्रिया प्रतिक्रिया का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है, इसमें शिक्षित और बुद्धि वाली नारी के वैवाहिक संबंधों में व्याप्त अस्थिरता और गहन अंतर्द्वंद को चित्रित किया गया है।
(2)बंदिनी:- इसकी घटना अंधविश्वास पर आधारित है।
(3)सत्ता के आर-पार:- यह नाटक जैन तीर्थंकर ऋषभदेव के जेष्ठ पुत्र महाराज भारत और उसके अनुज महाराज बाहुबली के बीच के सत्ता संघर्ष को प्रस्तुत करता है।
(4) गंधार की भिक्षुणी :- हूण अत्याचार और मानव उत्थान की कथा है, भिक्षुणी आनंदी का आत्म संघर्ष अभिशप्त महत्वपूर्ण प्रेम का वर्णन करता है।
(5)नव प्रभात :-विष्णु प्रभाकर पुरुष अशोक की मानवगत संवेदना और दुर्बलताओ का चित्रण करते हुए उन्हें एक मानव रूप मे प्रस्तुत करने का प्रयास करते है।
(6)केरल का क्रांतिकारी :-वेलूतमपी दलवा का अदम्य और अभूतपूर्व साहस का चित्रण किया गया है।
(7)टूटते परिवेश :-नाटक की समस्या यथार्थ जीवन की समस्या है मध्यम वर्गीय परिवार की कहानी प्रस्तुत की गई है।
(8)यूगे यूगे क्रांति :-विवाह के क्षेत्र में चिर काल से चली आ रही क्रांति का निरूपण किया गया है 1857 से अभी तक के सामाजिक परिवर्तन का तुलनात्मक अध्ययन करता है।
(9)श्वेत कमल:- अभिशप्त नारी की दर्दनाक दास्तां।
(10) कुहासा और किरण:- राजनीतिक जीवन से जुड़ा प्रसिद्ध नाटक।
जीवनी
- आवारा मसीहा – वर्ष 1974
- अमर शहीद भगतसिंह – वर्ष 1976
- सरदार वल्ल्भभाई पटेल – वर्ष 1976
- काका कालेलकर – वर्ष 1995
संस्मरण
- जाने अनजाने
- कुछ शब्द, कुछ रेखाएँ
- यादों की तीर्थयात्रा
- मेरे अग्रज: मेरे मीत
- समांतर रेखाएँ
- मेरे हमसफर
- राह चलते-चलते
कविता-संग्रह
- चलता चला जाँऊगा
निबंध
- जन समाज और संस्कृति: एक सम्रग दृष्टि
- क्या खोया क्या पाया
यात्रा वृतांत
- ज्योतिपुंज हिमालय
- जमुना गंगा के नैहर में
आत्मकथा
- पंखहीन – (तीन भागों में)
बाल साहित्य
- मोटे लाल
- कुंती के बेटे
- रामू की डोली
- दादा की कचहरी
- जब दीदी भूत बनी
- ‘ढलती रात’ किसका उपन्यास है?
- यह प्रतिष्ठित साहित्यकार विष्णु प्रभाकर का बहुचर्चित उपन्यास है, जिसका प्रकाशन वर्ष 1951 में हुआ था।
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