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सिविल सेवा


सिविल सेवा

विषय सूची

  • इतिहास
  • सिविल सेवाओं का विकास क्रम
  • भारतीय सिविल सेवा अधिनियम 1861
  • संविधान शक्ति और उद्देश्य
  • शासन प्रणाली

इतिहास

भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1947 में ब्रिटिश राज के भारतीय सिविल सेवा से इसका गठन किया गया।

  • सन्‌ 1947 में लोकसेवाओं का जो स्वरूप हमें विदेशियों से उत्तराधिकर स्वरूप प्राप्त हुआ, वह विदेशी शासन की स्वस्थ और प्रशंसनीय व्यवस्थाओं में एक था, यद्यपि इसकी संरचना में विदेशियों का प्रधान दृष्टिकोण इसे एक कल्याणकारी राज्य की जटिल और अनिवार्य आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना नहीं, वरन्‌ विधि और व्यवस्था (ला ऐण्ड आर्डर) की रक्षा मात्र था। राजनीतिक स्वतंत्रता तथा उसके परिणामस्वरूप राज्य के कार्यों में होनेवाले परिवर्तन का प्रभाव स्पष्ट रूप से भारतीय लोकसेवाओं पर पड़ा। परंतु सामान्य रूप में नागरिक सेवाएँ हमारे संविधान द्वारा निर्धारित व्यवस्थाओं के अंतर्गत, स्वतंत्र होने के पूर्व के विधि-विधानों एवं उद्देश्यों के अनुसार ही चल रही हैं।
  • स्वतंत्र भारत के समक्ष सर्वप्रमुख समस्या प्रशासकीय कर्मचारियों की थी, जो कि महत्वपूर्ण नागरिक सेवाओं जैसे, भारतीय नागरिक सेवा में रत विदेशी पदाधिकारियों के स्वदेश लौट जाने तथा भारत-विभाजन के कारण मुस्लिम पदाधिकारियों के पाकिस्तान चले जाने के कारण उत्पन्न हुई। इसके साथ ही परिवर्तित परिस्थितियों में भारत के अनुकूल सेवाओं के स्वरूप के निर्धारण की भी समस्या थी। महत्वपूर्ण सेवाओं में रिक्तता की स्थिति दुरंत थी। उदाहरण के लिए सन्‌ 1947 में भारतीय नागरिक सेवा (आई.सी.एस.) में 1064 पदाधिकारीं थे, जिनमें से केवल 451 पदाधिकारी 15 अगस्त सन्‌ ’47 के बाद सेवारत रहे। रिक्तताजन्य स्थित की गंभीरता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि केंद्र और राज्यों में भारतीय नागरिक सेवाओं के प्रमुख पदों पर प्रतिष्ठित 51 प्रतिशत ब्रिटिश पदाधिकारी भारत छोड़कर चले गए। इस रिक्तता की पूर्ति अविलंब अपेक्षित थी। अखिल भारतीय सेवाओं – भारतीय नागरिक सेवा (आई.सी.एस.), भारतीय पुलिस (आई-पी.) और साम्राज्य सचिवालय सेवा (इंपीरियल सेक्रेटरिएट सर्विस) सबमें समुचित उत्तराधिकारियों के चयन का व्यापक प्रयत्न किया गया। अक्टूबर, 1946 के आयोजित सम्मेलन के निश्चयानुसार आई.सी.एस. और आई.पी.एस. के स्थान पर प्रशासकीय सेवा (आई.ए.एस.) और भारतीय पुलिस सेवा (आई.पी.एस.) की स्थापना की गई। इसी प्रकार सन्‌ 1948 में हुए निश्चयों के अनुसार साम्राज्य सचिवालय सेवा (इंपीरियल सैक्रेटरिएट सर्विस) के स्थान पर केंद्रीय सचिवालय सेवा की स्थापना की गई। केंद्रीय सचिवालय के पुन:संगठन से संबद्ध अन्यान्य विषयों, जेसे – केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन भत्ते, उनकी सेवा की स्थितियों आदि के संबध में भी सन्‌ 1946 से 1950 तक अनेक आयोगों और समितियों द्वारा विचार किया गया और इस प्रकार सरकार को अनेक विवरण प्राप्त हुए जैसे 1545-46 में केंद्रीय प्रशासन के पुन:संगठन से संबंधित टाटेनहम रिपोर्ट (Tottenham), 1947 में केंद्रीय वेतन आयोग के विवरण तथा 1949 में सरकार की संरचना के संबंध में गोपाल स्वामी आयंगार रिपोर्ट। सन्‌ 1950 से लोकसेवाओं से संबद्ध अन्यान्य विषयों जैसे, – नई सेवाओं की स्थापना, राज्यों के विलयन के बाद सेवाओं की एकता तथा उनका पुन:संगठन, उनकी रचना, प्रक्रिया आदि पर तदर्थ समितियों, भारत सरकार के तत्संबंधी विभागों, योजना आयोग, लोक सभा की प्राक्कलन समितियों, प्रो॰ एपुलबी और अशोक चंडा जैसे विदेशी और भारतीय समीक्षकों, नई दिल्ली स्थित भारतीय लोक सेवा संस्थान (इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ पब्लिक ऐडमिनिस्ट्रेशन) तथा मसूरी स्थित राष्ट्रीय प्रशासकीय अकादमी (नेशनल एकेडमी ऑव ऐडमिनिस्ट्रेशन) आदि द्वारा विचार विमर्श और सर्वेक्षण किया गया। अभी हाल में कुछ महत्वपूर्ण विषयों पर गंभीरतापूर्वक विचार किया गया है; जैसे, – वेतन निर्धारण का प्रश्न और केंद्रीय कर्मचारियों की सेवा की शर्ते (जाँच आयोग – ‘द्वितीय वेतन आयोग’ 1957-59), लोकसेवाओं में भ्रष्टाचार (संतानम्‌ कमिटी रिपोर्ट, 1964) और प्रशासकीय दुर्व्यवहारों के विरुद्ध शिकायतों की सुनवाई की प्रक्रिया आदि। उपर्युक्त विषय तथा प्रशासकीय सुधारों से संबद्ध व्यापक प्रश्न भारत सरकार के गंभीर सर्वेक्षण के विषय रहे हैं। राजकीय सेवाओं के संबंध में इसी प्रकार के अध्ययन विभिन्न राज्यों में भी किए गए हैं।
  • 1947 से 50 की अवधि में इन सेवाओं की स्थापना तथा तत्संबंधी अन्य निश्चयों के साथ ही साथ संविधान सभा ने स्वतंत्र भारत के लिए एक संविधान का निर्माण कर दिया और विभिन्न रियासतों के विलयन के बाद देश में राजनीतिक एकता स्थापित हो गई। संविधान का स्वरूप, जिसके अधीन ये लोकसेवाएँ थीं, इन राजनीतिक परिवर्तनों को ध्यान में रखकर स्थिर किया गया था। संविधान का आदर्श यह था कि राज्य एक शक्तिसंपन्न प्रजातांत्रिक संगठन हो और वह धर्मनिरपेक्ष तथा कल्याणकारी राज्य हो, इस आशय के विचार संविधान की प्रस्तावना तथा मूलाधिकार और राज्य की नीति के निर्देशक तत्वोंवाले अध्याय में विस्तृत रूप से सन्निहित किए गए हैं। इस आदर्श की सिद्धि के लिए सरकार के कार्यों में आमूल परिवर्तन की अपेक्षा थी, क्योंकि राज्य को अब समाजसुधार की दिशा में सक्रिय कार्य करना था तथा समाजवाद की बुनियाद पर राजनीतिक प्रजातंत्र और विधि व्यवस्था के अनुकूल द्रुतगति से आर्थिक विकास की ओर अग्रसर होना था। इसके साथ ही संविधान ने ब्रिटिश संयुक्त राज्य के आदर्श पर प्रशासनिक कार्यों की संसदीय समीक्षा की भी व्यवस्था की। राजनीतिक कार्यपालिका (या मंत्रिमंडल) को संसद् अथवा विधानसभा के प्रति उत्तरदायी बनाया गया। संसद् या विधान सभा प्रश्न पूछ सकती थी, प्रस्ताव तथा निश्चय पारित कर सकती थी, सरकार की नीतियों पर बहस कर सकती थी और सार्वजनिक आय व्यय या प्राक्कलन समिति, सरकारी निश्चय, याचिका, गौण विधि व्यवस्था और सार्वजनिक कार्य संबंधी विभिन्न समितियों के माध्यम से सरकार के क्रिया कलापों का सर्वेक्षण कर सकती थी।
  • संपूर्ण देश में एक स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना की गई जिसके हाथ में इतनी शक्ति दी गई कि वह संविधान के प्रतिकूल विधियों को तथा प्रशासन के ऐसे आदेशों को रद्द कर सकती थी जो असंवैधानिक हों, अवैध हों या दुर्भावना से प्रेरित होकर जारी किए गए हों।
  • सरंचना या गठन की दृष्टि से भारत एक संघ राज्य के रूप में स्थापित हुआ। अतएव यहाँ दो प्रकार की सेवाएँ प्रचलित हुई – प्रथम, प्रत्येक संघटक राज्य में तथा दूसरी सेवाएँ केंद्रीय कार्यों के संपादनार्थ। कुछ भी हो, अखिल भारतीय सेवा के रूप में भारतीय प्रशासकीय सेवा (I.A.S.) और भारतीय पुलिस सेवा (I.P.S.) की स्थापना की गई। भारतीय नागरिक सेवाओं (I.C.S.) का भारतीय प्रशासकीय सेवाओं में विलय कर दिया गया यद्यपि उनकी सेवास्थितियों तथा अधिकारों की सुरक्षा की गई। संविधान ने अपेक्षाकृत अधिक संख्या में अखिल भारतीय सेवाओं की स्थापना की व्यवस्था की ही थी, 1955 के राज्य पुन:संगठन आयोग ने भी इसकी सिफारिश की। दिसंबर 1962 में एक संसदीय निश्चयानुसार भारतीय अभियंता (इंजीनियर) सेवा, भारतीय वन सेवा तथा भारतीय चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवा की भी स्थापना की सिफारिश की गई है।
  • फिर, यद्यपि राज्यों का ढाँचा संघात्मक बनाया गया था, तथापि सार्वजनिक सेवारत कर्मचारियों की मनमानी पदच्युति, स्थानांतरण, पदों के न्यूनीकरण आदि से बचाव के लिए सारे देश में एक जैसी व्यवस्था संविधान द्वारा की गई। समस्त देश में सार्वजनिक सेवाओं और पदों पर भरती और नियुक्ति लोकसेवा आयोगों के माध्यम से करने की व्यवस्था की गई। सेवा की स्थितियों, उन्नति, स्थानांतरण, अनुशासनिक कार्यवाही तथा सेवाकाल में हुई क्षति अथवा विवाद आदि की अवस्था में इन कर्मचारियों के अधिकारों से संबंधित नियमादि बनाने के संबंध में भी इन आयोगों की राय लेना आवश्यक माना गया।
  • संविधान द्वारा यह भी उपबंधित किया गया कि लोकसेवाओं में स्थान पाने का अवसर और स्वतंत्रता सबको समान रूप से सुलभ हो। यह विषय इतना महत्वपूर्ण समझा गया कि संविधान के मूलाधिकार संबंधी अध्याय में समाविष्ट किया गया। लोकसेवाओं में केवल अनुसूचित और पिछड़ी जातियों या जनजातियों के लिए स्थान सुरक्षित रखने की व्यवस्था की गई। यह भी निश्चय किया गया कि संसद अथवा संबंधित राज्य का विधानमंडल सेवाओं या पदों की स्थापना करेगा और इनमें नियुक्ति तथा सेवा की स्थिति आदि से संबधित नियमों का निर्माण करेगा। जब तक ऐसा न हो सके तब तक कार्यपालिका को यह अधिकार दिया गया कि वह इन विषयों से संबंद्ध निश्चय स्वत: कर ले और नियम बना ले जिनका प्रभाव विधि या कानून के समान ही माना जाए। 1947 से पूर्व प्रचलित नियम जारी रखे गए।
  • यहाँ आर्थिक ढाँचे पर भी विचार करना अपेक्षित है। आय के साधन जुटाना, केंद्र या राज्य की समेकित निधि (Consolidated fund) में सार्वजनिक कोश का न्यास, सार्वजनिक कोश का व्यय आदि विषयों के संबंध में निश्चय करने के लिए विधानमंडल की स्वीकृति आवश्यक मानी गई। कंट्रोलर या आडिटर जनरल द्वारा निर्धारित प्रपत्र के अनुसार इनका लेखा या हिसाब रखना आवश्यक बनाया गया। आडिटर जेनरल का यह भी काम था कि वह अखिल देशीय स्तर पर इनकी जाँच करके अपना विवरण राष्ट्रपति या राज्यपाल के सम्मुख प्रस्तुत करे। विधान मंडल के प्रत्येक सदन के समक्ष यह विवरण उपस्थित करना अनिवार्य माना गया और ऐसी व्यवस्था की गई कि सदन की वित्त समिति द्वारा इनकी समीक्षा की जाए। इस प्रकार यह प्रक्रिया ऐसी बनाई गई कि वित्त विभागों के अतिरिक्त संसद और कंट्रोलर तथा आडिटर जनरल यह निश्चय कर सकें कि राजस्व की प्राप्ति कम खर्च में योग्यतापूर्वक की जा रही है और उसका उपयोग भी समुचित रूप से हो रहा है।
  • इस प्रकार स्वयं संविधान से ही ऐसी व्यवस्था कर दी गई जिससे लोकसेवाएँ संसद् और न्यायपालिका के प्रति उत्तरदायी और अनुप्रवृत्त रहें। उद्देश्य यह था कि संसद् में समाचारपत्रों तथा सार्वजनिक संस्थाओं में आलोचना तथा भंडाफोड़ का भय तथा न्यायालय में प्रशासकीय आदेशों को चुनौती दिए जाने का भय लोकसेवाओं में नियुक्त कर्मचारियों की परंपरागत निरंकुशता तथा नौकरशाही प्रवृत्ति को संतुलित तथा स्वस्थ बनाने में सहायक हो।
  • 1950 के बाद विकसित लोकसेवाओं की संरचना पर विचार करने से स्पष्ट है कि भारत में तीन प्रकार की सेवाएँ प्रचलित हैं – केंद्रीय सेवाएँ, राज्यसेवाएँ और अखिल भारतीय सेवाएँ जो दोनों क्षेत्रों में
  • कार्य करती हैं। जैसा कि ऊपर बतलाया गया है, अखिल भारतीय सेवाएँ भारतीय नागरिक सेवा (आई.सी.एस.) तथा भारतीय पुलिस सेवा (आई.पी.एस.) की उत्तराधिकारिणी ही हैं। शासन का संघीय रूप स्थापित हो जाने पर भी ये कायम रखी गई हैं जिससे देश की एकता को बल मिले, सुनियोजित प्रशासकीय विकास संभव हो सके, राज्यों में उच्च-योग्यता-युक्त प्रतिभासंपन्न पदाधिकारी नियुक्त हो सकें, राजकीय प्रशासन में पारंगत इन पदाधिकारियों के सहयोग से केंद्रीय सरकार केंद्रीय स्तर पर अखिल भारतीय नीतियों का निर्धारण करने में सक्षम हो सके। केंद्र तथा राज्य दोनों में सार्वजनिक कर्मचारी नियमित सेवाओं के रूप में संघटित किए जा सकते हैं या तात्कालिक और अस्थायी पदों पर काम कर सकते हैं। लोकसेवाएँ अथवा लोकसेवकों के पद तकनीकी हो सकते हैं या गैर तकनीकी। ये सभी सेवाएँ स्थूल रूप में उच्च, अधीनस्थ और निम्न श्रेणियों में याने प्रथम द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ श्रेणियों में वर्गीकृत की जा सकती हैं, यद्यपि एक ही वर्ग में भी वेतन और प्रतिष्ठा की मात्रा में अंतर अब भी कायम है। उच्चतम और निम्नतम वर्गों के पदाधिकारियों में वेतन का जो अंतर था उसे थोड़ा कम करने का प्रयत्न अवश्य किया गया है। अब भी संपूर्ण वेतनराशि का अधिकांश लोकसेवा के उच्च और मध्यवर्गीय कर्मचारियों में वितरित होता है। सन्‌ 1947 में सरकारी कर्मचारियों की संख्या सात लाख से कुछ ही अधिक थी। 1961 तक यह संख्या बढ़ते बढ़ते बीस लाख से भी अधिक हो गई, फिर भी लोकसेवाओं का स्वरूप या ढाँचा पहले जैसा ही है। राजपत्रित और अराजपत्रित तथा स्थायी और अस्थायी कर्मचारियों का भेद अब तक प्राय: उसी अनुपात में चलता आ रहा है।
  • अखिल भारतीय स्तर की भारतीय प्रशासकीय सेवाएँ तथा भारतीय विदेशी सेवाएँ (I.F.S.) दो अत्यंत सम्मानित सेवाएँ हैं। दूसरी अर्थात्‌ आई.एफ.एस. अपेक्षाकृत नए प्रकार की सेवाएँ हैं, यद्यपि भारतीय नागरिक सेवाओं (I.C.S.) में कार्य करनेवाले कुछ कर्मचारी इन सेवाओं में भी प्रगृहीत कर लिए गए हैं। भारतीय प्रशासकीय सेवाओं के कई विभाग किए जा सकते हैं –
  • (क) भारतीय नागरिक सेवाओं के अवशिष्ट उत्तराधिकारी, जिनकी संख्या वर्तमान में दो सौ से कम ही हैं,
  • (ख) युद्धसेवाओं में नियुक्त कर्मचारी,
  • (ग) आपत्कालीन अथवा विशेष प्रयोजनों के लिए नियुक्त कर्मचारी, (1947 और 1956-57 में नियुक्त);
  • (घ) 1948 के बाद नियमित रूप से नियुक्त कर्मचारी और
  • (ङ) राज्य सेवाओं से क्रमश: उन्नतिप्राप्त कर्मचारी, जिनमें 1958 के बाद से जम्मू और कश्मीर के कर्मचारी भी सम्मिलित हैं।
  • भारतीय प्रशासकीय सेवाओं में नियुक्त कुल कर्मचारियों की संख्या संप्रति में लगभग 2300 है, यद्यपि कार्यरत कर्मचारियों की संख्या इससे न्यूनाधिक दो सौ कम होगी। भारतीय प्रशासकीय सेवाओं और भारतीय विदेशी सेवाओं में नियुक्ति एक कड़ी प्रतिद्वंद्वात्मक परीक्षा के आधार पर होती है, अंशत: इसी प्रकार की परीक्षा प्रथम वर्ग की अप्राविधिक सेवाओं तथा द्वितीय वर्ग की कुछ सेवाओं में भी होती है। उनका वेतनमान अन्य सेवाओं की तुलना में अधिक है। यद्यपि केंद्रीय सचिवालय में, वित्त और व्यापार विभाग को सम्मिलित करके भारतीय नागरिक सेवाओं के कर्मचारियों के लिए स्थान सुरक्षित रखने की व्यवस्था अब नहीं है, तथापि सचिवालय के प्राय: सभी उच्चतर पद भारतीय प्रशासकीय सेवाओं के स्थानापन्न कर्मचारियों के हाथ में हैं हालाँकि केंद्रीय सचिवालय सेवा के पदाधिकारी अब अंडर सेक्रेटरी या डिप्टी सेक्रेटरी के अधिकतर पदों पर कार्य कर रहे हैं। संयुक्त सचिव (ज्वाइंट सेक्रेटरी) के 75 प्रतिशत पदों तथा केंद्रीय सचिवालय के इससे भी अधिक पदों पर भारतीय नागरिक सेवाओं अथवा भारतीय प्रशासकीय सेवाओं के कर्मचारी आसीन हैं। 1959 से एक केंद्रीय प्रशासकीय सेवा के श्रेष्ठ कर्मचारी होते हैं। इसका उद्देश्य यह है कि विशेष महत्व के पदों पर योग्य व्यक्ति बिना किसी व्यवधान के मिलते जाएँ। इसी तरह औद्योगिक व्यवस्था निकाय की स्थापना इस उद्देश्य से की गई है कि उद्योग और सार्वजनिक कार्यों के योग्य पदाधिकारी सरलतापूर्वक उपलब्ध हो सकें। भारतीय प्रशासकीय सेवाओं के कार्यों में जो परिवर्तन हुए ये भी उल्लेखनीय हैं। जहाँ इसकी पूर्ववर्तिनी भारतीय नागरिक सेवा का प्रधान उद्देश्य केंद्रीय और प्रांतीय सचिवालय अथवा जिला प्रशासन के माध्यम से राज्य की नियमित व्यवस्था करना था, वहीं भारतीय प्रशासकीय सेवाओं के जिम्मे तरह तरह के कार्य रहते हैं। जिले तथा राज्य की नियमित व्यवस्था अब भी उनका एक प्रधान कार्य है परंतु भारतीय प्रशासकीय सेवा के बहुसंख्यक कर्मचारी अन्यान्य कार्यों में प्रवृत्त होते हैं, जैसे – आर्थिक विकास, पंचायती राज, भूमि-सुधारसंबंधी व्यवस्था तथा सरकार के विभिन्न विभागों, प्राविधानिक संघो अथवा सरकारी संस्थानों द्वारा संचालित औद्योगिक एवं अन्य प्रकार के रचनात्मक कार्य। विकासगति की तीव्रता के कारण इन सेवाओं के कार्यभार निरंतर बढ़ता जा रहा है। उदाहरणार्थ, महाराष्ट्र राज्य में स्थापित नवीन प्रकार के पंचायती राज के प्रचलन से जिला स्तर पर द्वैध प्रशासन दिखलाई पड़ता है। वहँ पर विकास कार्य और समान्य प्रशासन अलग अलग कर दिए गए हैं। प्रशासन के ये दोनों विभाग भारतीय प्रशासकीय सेवा के पदाधिकारियों के अधीन रखे गए हैं। प्रथम विभाग का प्रधान मुख्य प्रशासनिक अधिकारी तथा द्वितीय विभाग का प्रधान जिलाधीश बनाया गया है। 15 अगस्त 1962 से प्रचलित इस निश्चय के अनुसार महाराष्ट्र में प्रशासकीय सेवा में 25 अतिरिक्त पदाधिकारियों की आवश्यकता होती अर्थात्‌ प्रत्येक जिले में एक अतिरिक्त पदाधिकारी की नियुक्ति अपेक्षित थी। अतएव इन नए कार्यों के विकास से स्वाभाविक ही था कि यह सेवा सामान्य प्रकृति की हो जाए, जो कि भारतीय नागरिक सेवा या भारतीय प्रशासकीय सेवाओं की स्थापना का मूलभूत उद्देश्य था। इस उद्देश्य के अनुकूल प्रवेश के पूर्व मध्यवर्ती स्तर पर तथा अन्य स्तरों पर गंभीर प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई। प्रशिक्षण की अवधि में प्रशिक्षार्थी की अवाप्ति अथवा लोकसेवा के प्रारंभिक सिद्धांतों में निष्णात कुशल पदाधिकारी की प्राप्ति पर ही बल नहीं दिया जाता था, वरन्‌ लोकसेवा के प्रति समुचित प्रवृत्ति की भी अपेक्षा की जाती थी।
  • प्राय: यह परामर्श दिया जाता है कि उत्तरदायी और अधिक प्रभावकारी होने के लिए किसी शासनतंत्र को उस समाज का प्रतिनिधि होना चाहिए जिसकी वह सेवा करता है। संसदीय लोकतंत्र में तो इसकी और भी अपेक्षा है। यह बात उत्साहवर्धक है कि जहाँ तक भारत में उच्चतर प्रशासकीय पदाधिकारियों का प्रश्न है, उनमें यह स्थिति क्रमश: शीघ्रता के साथ बढ़ रही है। सन्‌ 1960 में राष्ट्रीय प्रशासकीय अकादमी में तत्कालीन प्रशासकीय सेवा के 2010 कर्मचारियों में से 615 कर्मचारियों की एक अध्ययन गोष्ठी उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि का पता लगान के लिए आयोजित की गई थी। यह पाया गया कि असम, पश्चिमी बंगाल, उड़ीसा और आंध्रप्रदेश के अतिरिक्त समस्त देश का पूर्ण प्रतिनिधित्व इस सेवा में हो रहा था। यह क्षेत्रीय असंतुलन 1960 के बाद की गई नियुक्तियों में एक सीमा तक दूर किया जा सका है और उक्त राज्यों का प्रतिनिधित्व पर्याप्त बढ़ गया है। यह कहना असत्य है कि इस सेवा में केवल संपन्न व्यक्तियों, पब्लिक स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करनेवालों तथा विदेशों में योग्यता हासिल करनेवालों का प्रतिनिधित्व होता है। सर्वेक्षण से यह ज्ञात होता है कि इन सेवाओं में तीन सौ रुपए मासिक से भी कम आयवाले परिवरों के प्रतिनिधित्व में निश्चित रूप से वृद्धि हुई है। सन्‌ 1961 में उनकी संख्या 31 प्रतिशत से अधिक थी, यद्यपि कुल नियुक्त होनेवाले लोगों में अब भी बड़ी संख्या उन मध्यमवर्गीय परिवारों के प्रवेशार्थियों की थी जिनकी मासिक आय तीन सौ से आठ सै रुपए के बीच है। फिर, इस दशक के केवल दस प्रतिशत ऐसे लोग ही सेवा में प्रविष्ट हुए हैं जिनकी शिक्षादीक्षा प्रसिद्ध पब्लिक स्कूलों में हुई है। जो हो, यह सत्य है कि इस सेवा में नियुक्त होनेवालों में से अधिकांश के अभिभावक सरकारी कर्मचारी हैं। नियक्त होनेवालों में अध्यापकों की संख्या भी काफी अच्छी थी। इनमें कुछ विश्वविद्यालय अब भी अन्य विश्वविद्यालयों की अपेक्षा अधिक प्रतिनिधित्व पा जाते थे। मद्रास विश्वविद्यालय का स्थान अब भी प्रथम था जिसके विद्यार्थी भारतीय नागरिक सेवाओं में 27 प्रतिशत से भी अधिक स्थान प्राप्त कर लेते थे। द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ स्थान क्रमश: दिल्ली, पंजाब और इलाहाबाद विश्वविद्यालय का था। संभवत: यह देश में शिक्षास्तर की विभिन्नता का सूचक हो। इस सेवा में समाज के हीन वर्गों विशेषत: अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का प्रतिनिधित्व क्रमश: बढ़ता गया है। केवल सन्‌ 1961 में हुई नियुक्तियों में ही 100 में से 32 पदाधिकारी इन वर्गों से लिए गए थे।
  • सन्‌ 1950 के बाद से लोकसेवा के प्रवेशार्थियों तथा इनमें नियुक्त पदाधिकारियों के प्रशिक्षणार्थ अनेक प्रशिक्षण संस्थाएँ विकसित हुईं। सन्‌ 1959 में ‘आई.ए.एस. ट्रेंनिग स्कूल’ का पुनर्गठन ‘नेशनल ऐकेडमी ऑव ऐडमिनिस्ट्रेशन’ के रूप में हुआ। यह एक ऐसी आधिकारिक संस्था थी जो अखिल भारतीय सेवाओं में प्रत्यक्षत: नियुक्त प्रवेशार्थियों को प्रशिक्षित करती थी। केंद्रीय अप्राविधिक सेवाओं में नियुक्त होनेवाले लोगों को भी यही प्रशिक्षित करती थी। इस राष्ट्रीय अकादमी का विकास आवश्यकतानुरूप हुआ। अपने प्रशिक्षण के कार्यक्रम में इसने एक विकासमान देश की अपेक्षाओं को ध्यानस्थ रखा है। इसी प्रवृत्ति से यह उपर्युक्त रचनाविधान से युक्त हो कार्य करती है। प्रशिक्षण की अवधि में संविधान, लोकसेवा के सिद्धांत, विधि या कानून, भारतीय संस्कृति और सभ्यता, भाषाविज्ञान तथा अन्यान्य संबद्ध विषयों का अध्ययन अनिवार्य होता है। साथ ही प्रशिक्षार्थी को इन सेवाओं के इतिहास और परंपराओं से परिचित कराते हुए उसे इनके योग्य बनाया जाता है। उसे इस प्रकार की शिक्षा दी जाती है कि उसमें स्वस्थ चिंतन तथा अच्छी आदतों को अपनाने की प्रवृत्ति विकसति हो। प्रशिक्षार्थी को सदैव परामर्श दिया जाता है कि वह संबद्ध विषय तथा अन्य समस्याओं पर संतुलित दृष्टिकोण से विचार करे और मित्रों के साथ सहयोगपूर्वक कार्य करने की प्रवृत्ति अपने में विकसित करे। इस अवधि में उसमें यह प्रवृत्ति भी विकसित की जाती है कि वह दूसरी सेवाओं का महत्व मनोयोगपूर्वक समझे। प्रशिक्षार्थी को रचनात्मक अनुभव और अध्ययन के लिए बाहर ले जाया जाता है। इस प्रकार अब तक वर्तमान वेतन तथा सम्मानदृष्टि की असमानता के बावजूद भी उनमें सहयोग तथा समस्त लोकसेवाओं में मनोयोगपूर्ण रुचि लेन की प्रवृत्ति विकसित की जाती है। यह अकादमी मध्यम स्तर के प्रशासकों की आवश्यकता पर भी ध्यान रखती है, तथा तदर्थ व्यावसायिक महत्व के विषयों के गहन अध्ययन के लिए प्रबोधन पाठ्यक्रमों का आयोजन करती है। विभागीय कर्मचारियों, प्रत्यक्ष रूप से भरती किए गए प्रवेशार्थियों तथा पुनर्बोध पाठ्यक्रमवालों द्वारा अकादमी में जो अनुसंधानकार्य संपन्न होता है उसे अकादेमी की मुख पत्रिका में प्रकाशित कराया जाता है जिसमें लोक-सेवा-संबंधी महत्वपूर्ण विवरण और दृष्टिकोण रहते हैं।
  • हैदराबाद स्थित ऐडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ कालेज व इंडियन इंस्टीच्यूट ऑव कम्यूनिटी डेवलपमेंट, नई दिल्ली स्थित इंडियन इंस्टीच्यूट ऑव पब्लिक ऐडमिनिस्ट्रेशन तथा विभिन्न राज्यों और सार्वजनिक प्रतिष्ठानों द्वारा संचालित अनेक प्रशिक्षण संस्थान, औद्योगिक व्यवस्था, सामुदायिक विकास तथा प्रशासन से संबद्ध अन्यान्य विषयों का प्रशिक्षण करते हैं तथा इन विषयों में गहन अनुसंधान करने के लिए प्रबोधन पाठ्यक्रम आयोजित करते हैं। इन संस्थानों में किया गया अधिकांश कार्य उच्चस्तर का होता है।
  • बहुधा एक प्रश्न यह पूछा जाता है कि आई.सी.एस. की अनुवर्तिनी आई.ए.एस. में सेवारत अधिकारी क्या योग्यता, कार्यक्षमता, निष्ठा तथा स्वतंत्रता आदि उन गुणों से युक्त हैं जिनके कारण आई.सी.एस. से घृणा करनेवाले लोग भी उनकी प्रशंसा किया करते थे, भले ही वे उन्हें विदेशी तथा भारतविरोधी समझते रहे हों? यदि दोनों प्रकार की सेवाओं की विभिन्न स्थितियों को ध्यान में रखा जाए तथा भारतीय प्रशासकीय सेवा की संरचना और उसके उस राजनीतिक ढाँचे पर विचार किया जाए जिसमें छोटी से छोटी असफलता भी आलोचना, प्रत्यालोचना का विषय बन जाती है, तो निश्चित रूप से उक्त प्रश्न का उत्तर सकारात्मक होगा। यह भी उल्लेखनीय है कि स्वतंत्रताप्राप्ति के बाद की संघर्षमय स्थिति में भारतीय नागरिक सेवा के जो पदाधिकरी कार्यरत थे उन्होंने देश के राजनीतिक नेतृत्व में कम सहायता नहीं प्रदान की। उन्होंने विभिन्न समस्याओं के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण सहयोग देकर सत्तापरिवर्तन को प्रभावकारी बनाया तथा भारतीय प्रशासकीय सेवा के नए सहयोगियों के साथ उन लोगों ने प्रारंभिक विकास के कार्य में अपने प्रशासकीय दायित्वों का निर्वाह किया।
  • कर्मचारियों की नौकरशाही (निरंकुश व्यवहार), लालफीताशाही एवं भ्रष्टाचार की व्यापक भर्त्सना के बावजूद हमारे प्रशासकीय संगठन और लोकसेवाओं के अधिकारी नैतिकता का उच्चादर्श बनाए रखने और कर्तव्य के प्रति एकनिष्ठ रहने के लिए प्रयत्नशील रहे हैं। अनेक निष्पक्ष पर्यवेक्षकों द्वारा यह बात स्वीकार की गई है। इसका तात्पर्य यह नहीं कि इस क्षेत्र में सुधार या परिवर्तन के लिए गुंजाइश नहीं है, तथापि इस संबंध में अनावश्यक रूप से चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है।

सिविल सेवाओं का विकास क्रम

  • प्राचीन भारत में यद्यपि आधुनिक अर्थ एवं आयाम वाली सिविल सेवा के स्पष्ट उदाहरण नहीं मिलते फिर भी तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप सिविल सेवाओं का गठन किया गया था। मौर्य प्रशासन में सिविल सेवाओं का संकेत मिलता है, जिसमें ‘अध्यक्ष’, ‘राजुक’, ‘पण्याध्यक्ष’, ‘सीताध्यक्ष’ जैसे सिविल सेवा अधिकारी महत्त्वपूर्ण भूमिका में थे। मुगल काल के दौरान अकबर ने एक भूमि राजस्व प्रणाली प्रारंभ की जिसके कार्यान्वयन के लिये नए पदों का सृजन किया गया। 
  • भारत में सिविल सेवा के वर्तमान ढाँचे की शुरुआत लार्ड कार्नवालिस द्वारा की गई। कार्नवालिस ने इन सेवाओं को पेशेवर सेवाओं में परिवर्तित कर ब्रिटिश साम्राज्य की नीतियों को कार्यान्वित करने का उपकरण बनाया। 1857 में मैकाले समिति की सिफारिशों के आधार पर सिविल सेवाओं में चयन के लिये प्रतियोगी परीक्षा को लागू किया गया। 
  • स्वतंत्रता के बाद भारतीय सिविल सेवाओं को भारतीय लोकतांत्रिक एवं कल्याणकारी राज्य के आदर्शों को लागू करने का साधन बनाया गया। इन सेवाओं ने ‘स्टील फ्रेम’ की तरह कार्य करते हुए भारतीय एकता, अखंडता और संप्रभुता को अक्षुण्ण बनाने का कार्य किया।
  • वर्तमान में भारतीय सेवाओं की प्रकृति विनियामक के स्थान पर समन्वयक की हो गई है। सुशासन की बढ़ती मांगों, सिटिज़न चार्टर, सूचना का अधिकार, अधिकारों के प्रति जागरूकता, सेवा प्रदाता राज्य की अवधारणा आदि स्थितियों ने सिविल सेवाओं की तटस्थता, निष्पक्षता, वस्तुनिष्ठता और दक्षता में वृद्धि कर उसे समाजिक-आर्थिक न्याय की दिशा में उन्मुख किया है।

लार्ड कार्नवालिस (गवर्नर-जनरल, 1786-93) पहला गवर्नर-जनरल था, जिसने भारत में इन सेवाओं को प्रारंभ किया तथा उन्हें संगठित किया। उसने भ्रष्टाचार को रोकने के लिये निम्न कदम उठाये-

  • वेतन में वृद्धि।
  • निजी व्यापार पर पूर्ण प्रतिबंध।
  • अधिकारियों द्वारा रिश्वत एवं उपहार इत्यादि लेने पर पूर्ण प्रतिबंध।
  • वरिष्ठता (seniority) के अधर पर तरक्की (Promotion) दिए जाने को प्रोत्साहन।

वर्ष 1800 में, वैलेजली (गवर्नर-जनरल, 1798-1805) ने प्रशासन के नये अधिकारियों को प्रशिक्षण देने हेतु फोर्ट विलियम कालेज की स्थापना की। वर्ष 1806 में कोर्ट आफ डायरेक्टर्स ने वैलेजली के इस कालेज की मान्यता रद्द कर दी तथा इसके स्थान पर इंग्लैण्ड के हैलीबरी (Haileybury) में नव-नियुक्त अधिकारियों के प्रशिक्षण हेतु ईस्ट इंडिया कॉलेज की स्थापना की गयी। यहां भारत में नियुक्ति से पूर्व इन नवनियुक्त प्रशासनिक सेवकों को दो वर्ष का प्रशिक्षण लेना पडता था।

1853 का चार्टर एक्ट

इस एक्ट के द्वारा नियुक्तियों के मामले में डायरेक्टरों का संरक्षण समाप्त हो गया तथा सभी नियुक्तियां एक प्रतियोगी परीक्षा के द्वारा की जाने लगीं जिसमें किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं रखा गया।

कंपनी के उच्च पदों में नियुक्ति के लिये प्रारंभ से ही भारतीयों के लिये द्वार पूर्णतया बंद थे। कार्नवालिस का विचार था कि “हिन्दुस्तान का प्रत्येक नागरिक भ्रष्ट है।” 1793 के चार्टर एक्ट द्वारा 500 पाउंड वार्षिक आय वाले सभी पद, कंपनी के अनुबद्ध अधिकारियों (Covenanted Servents) के लिये आरक्षित कर दिये गये थे। कंपनी के प्रशासनिक पदों से भारतीयों को पृथक रखने के निम्न कारण थे-

  • अंग्रेजों का यह विश्वास कि ब्रिटिश हितों को पूरा करने के लिये अंग्रेजों को ही प्रशासन का दायित्व संभालना चाहिये।
  • अंग्रेजों की यह धारणा कि भारतीय, ब्रिटिश हितों के प्रति अयोग्य, अविश्वसनीय एवं असंवेदनशील हैं।
  • यह धारणा कि जब इन पदों के लिये यूरोपीय ही पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं तथा उनके बीच ही इन पदों को प्राप्त करने हेतु कड़ी प्रतिस्पर्धा है, तब ये पद भारतीयों को क्यों दिये जायें।

यद्यपि 1833 के चार्टर एक्ट द्वारा कंपनी के पदों हेतु भारतीयों के लिये भी प्रवेश के द्वार खोल दिये गये किंतु वास्तव में कभी भी इस प्रावधान का पालन नहीं किया गया। 1857 के पश्चात, 1858 में साम्राज्ञी विक्टोरिया की घोषणा में यह आश्वासन दिया गया कि सरकार सिविल सेवाओं में नियुक्ति के लिये रंग के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगी तथा सभी भारतीय स्वतंत्रतापूर्वक अपनी योग्यतानुसार प्रशासनिक पदों को प्राप्त करने में सक्षम होगे। किंतु इस घोषणा के पश्चात भी सभी उच्च प्रशासनिक पद केवल अंग्रेजों के लिये ही सुरक्षित रहे। भारतीयों को फुसलाने एवं समानता के सिद्धांत का दिखावा करने के लिए डिप्टी मैजिस्ट्रेट तथा डिप्टी कलेक्टर के पद सृजित कर दिये गये, जिससे भारतीयों को लगा कि वे इन पदों को प्राप्त कर सकते हैं किंतु स्थिति ज्यों की त्यों बनी रही।

भारतीय सिविल सेवा अधिनियम, 1861 Indian Civil Services Act 1861

इस अधिनियम द्वारा कुछ पद अनुबद्ध सिविल सेवकों के लिये आरक्षित कर दिये गये किंतु यह व्यवस्था की गयी कि प्रशासनिक सेवाओं में भर्ती के लिये अंग्रेजी माध्यम से एक प्रवेश परीक्षा इंग्लैण्ड में आयोजित की जायेगी, जिसमें ग्रीक एवं लैटिन इत्यादि भाषाओं के विषय होगे। प्रारंभ में इस परीक्षा के लिये आयु 23 वर्ष थी। तदुपरांत यह 23 वर्ष से, 22 वर्ष (1860 में), फिर 21 वर्ष (1866 में) और  अंत में घटाकर 19 वर्ष (1878) में कर दी गयी।

1863 में, सत्येंद्र नाथ टैगोर ने इंडियन सिविल सर्विस में सफलता पाने वाले प्रथम भारतीय होने का गौरव प्राप्त किया।

1878-79 में, लार्ड लिटन ने वैधानिक सिविल सेवा (Statutory Civil Service) की योजना प्रस्तुत की। इस योजना के अनुसार, प्रशासन के 1/6 अनुबद्ध पद उच्च कुल के भारतीयों से भरे जाने थे। इन पदों के लिये प्रांतीय सरकारें सिफारिश करेंगी तथा वायसराय एवं भारत-सचिव की अनुमति के पश्चात उम्मीदवारों की नियुक्ति कर दी जायेगी। इनकी पदवी और वेतन संश्रावित सेवा से कम होता था। लेकिन यह वैधानिक सिविल सेवा असफल हो गयी तथा 8 वर्ष पश्चात इसे समाप्त कर दिया गया।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मांग

1885 में अपनी स्थापना के पश्चात कांग्रेस ने मांग की कि-

  • इन सेवाओं में प्रवेश के लिये आयु में वृद्धि की जाये। तथा
  • इन परीक्षाओं का आयोजन क्रमशः ब्रिटेन एवं भारत दोनों स्थानों में किया जाये।

लोक सेवाओं पर एचिसन कमेटी, 1886 (Aitchison Committee on Public Services, 1886)

इस कमेटी का गठन डफरिन ने 1886 में किया। इस समिति ने निम्न सिफारिशें की-

  • इन सेवाओं में अनुबद्ध (Covenanted) एवं अ-अनुबद्ध (uncovenanted) शब्दों को समाप्त किया जाये।
  • सिविल सेवाओं को तीन भागों में वर्गीकृत किया जाये-
  • सिविल सेवाः इसके लिये प्रवेश परीक्षायें इंग्लैण्ड में आयोजित की जायें।
  • प्रांतीय सिविल सेवाः इसके लिये प्रवेश परीक्षायें भारत में आयोजित की जाये।
  • अधीनस्थ सिविल सेवाः इसके लिये भी प्रवेश परीक्षायें भारत में आयोजित की जाये।
  • सिविल सेवाओं में आयु सीमा को बढ़ाकर 23 वर्ष कर दिया जाये। 1893 में, इंग्लैण्ड के हाऊस आफ कामन्स में यह प्रस्ताव पारित किया गया की इन सेवाओं के लिए प्रवेश परीक्षाओं का आयोजन अब क्रमशः इंग्लैंड एवं भारत दोनों स्थानों में किया जायेगा। किंतु इस प्रस्ताव को कभी कार्यान्वित नहीं किया गया। भारत सचिव किम्बरले ने कहा कि “सिविल सेवाओं में पर्याप्त संख्या में यूरोपीयों का होना आवश्यक है। यह एक ऐसा मुद्दा है, जिसे त्यागा नहीं जा सकता”।

संविधान शक्ति और उद्देश्य

नई अखिल भारतीय सेवा या केंद्रीय सेवाओं के गठन के लिए संविधानराज्य सभा को दो-तिहाई बहुमत द्वारा इसे भंग करने की क्षमता द्वारा अधिक सिविल शाखाओं को स्थापित करने की शक्ति प्रदान करती है। भारतीय वन सेवा और भारतीय विदेश सेवा, दोनों सेवाओं को संवैधानिक प्रावधान के तहत स्थापित किया गया है।

सिविल सेवकों की जिम्मेदारी भारत के प्रशासन को प्रभावी ढंग से और कुशलतापूर्वक चलाने की है। यह माना जाता है कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के प्रशासन को अपनी प्राकृतिक, आर्थिक और मानव संसाधनों के कुशल प्रबंधन की आवश्यकता है। मंत्रालय के निर्देशानुसार नीतियों के तहत कई केंद्रीय एजेंसियो के माध्यम से देश को प्रबंधित किया जाता है।

सिविल सेवाओं के सदस्य केन्द्र सरकार और राज्य सरकार में प्रशासक के रूप में, विदेशी दूतावासों / मिशनों में दूतों; कर संग्राहक और राजस्व आयुक्त के रूप में, सिविल सेवा कमीशन पुलिस अधिकारियों के रूप में, आयोगों और सार्वजनिक कंपनियों में एक्जीक्यूटिव के रूप में और स्थायी रूप से संयुक्त राज्य के प्रतिनिधित्व और इसके एजेंसियों के रूप में प्रतिनिधित्व करते हैं।

शासन प्रणाली

भारतीय सिविल सेवा के प्रमुख

सर्वोच्च रैंकिंग सिविल सेवक गणतंत्र भारत के मंत्रिमंडल सचिवालय का प्रमुख होता है जो कि कैबिनेट सचिव भी होता है। वह भारत गणराज्य की सिविल सेवा बोर्ड का पदेन और अध्यक्ष होता है; भारतीय प्रशासनिक सेवा का अध्यक्ष और भारतीय सरकार के व्यापार नियम के तहत सभी नागरिक सेवाओं का अध्यक्ष होता है।

पद धारकों को यह सुनिश्चित करना होता है कि सिविल सेवा कौशल और क्षमता के साथ अधिग्रहित है और रोजमर्रा की चुनौतियों का सामना करनी की क्षमता है और सिविल सेवक एक निष्पक्ष और सभ्य वातावरण में काम करने के लिए जवाबदेह है।

नाम तिथियां
एन.आर. पिल्लै 1950 से 1953
वाय.एन सुकथांकर 1953 to 1957
एम. के वेलोडी 1957 to 1958
विष्णु सहाय 1958 to 1960
बी.एन झा 1960 to 1961
विष्णु सहाय 1961 to 1962
एस. एस खेरा 1962 to 1964
धरम वीरा 1964 to 1966
डी. एस. जोशी 1966 to 1968
बी. सिवरमन 1969 to 1970
टी. स्वामीनाथन 1970 to 1972
बी.डी. पाण्डे 1972 to 1977
एन.के. मुखर्जी 1977 to 1980
एस. एस. ग्रेवाल 1980 to 1981
सी.आर कृष्णास्वामी राव 1981 to 1985
पी.के.कॉल 1985 to 1986
बी. जी. देशमुख 1986 to 1989
टी.एन सेशन 1989 to 1989
वी.सी. पाण्डे 1989 to 1990
नरेश चंद्रा 1990 to 1992
एस. राजगोपाल 1992 to 1993
जफर सैफुल्लाह 1993 to 1994
सुरेन्द्र सिंह 1994 to 1996
टी.एस.आर सुब्रमण्यम 1996 to 1998
प्रभात कुमार 1998 to 2000
टी.आर. प्रसाद 2000 to 2002
कमल पांडे 2002 to 2004
बी.के. चतुर्वेदी 2004 to 2007
के.एम. चंद्रशेखर  
ए के सेथ 20११ से अब तक

शासन प्रणाली

अखिल भारतीय सिविल सेवा

भारतीय प्रशासनिक सेवा

भारतीय प्रशासनिक सेवा (अंग्रेजी: Indian Administrative Service)IAS अखिल भारतीय सेवाओं में से एक है। इसके अधिकारी अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी है। भारतीय प्रशासनिक सेवा (तथा भारतीय पुलिस सेवा) में सीधी भर्ती संघ लोक सेवा आयोग (यूनियन पब्लिक सर्विस कमिशन -UPSC) द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से की जाती है तथा उनका आवंटन भारत सरकार द्वारा राज्यों को कर दिया जाता है।

आईएएस अधिकारी केंद्रीय सरकार, राज्य सरकारों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों  में रणनीतिक और महत्वपूर्ण पदों पर काम करते हैं। सरकार के वेस्टमिंस्टर प्रणाली के बाद दूसरे देशों की तरह, भारत में स्थायी नौकरशाही के रूप में आईएएस भारत सरकार के कार्यकारी का एक अविभाज्य अंग है, और इसलिए प्रशासन को तटस्थता और निरंतरता प्रदान करता है।

भारतीय पुलिस सेवा (IPS आईपीएस) और भारतीय वन सेवा (आईएफएस / आईएफओएस) के साथ, आईएएस तीन अखिल भारतीय सेवाओं में से एक है – इसका संवर्ग केंद्र सरकार और व्यक्तिगत राज्यों दोनों के द्वारा नियोजित है।

उप-कलेक्टर/मजिस्ट्रेट के रूप में परिवीक्षा के बाद सेवा की पुष्टि करने पर, आईएएस अधिकारी को कुछ साल की सेवा के बाद जिला मजिस्ट्रेट और कलेक्टर के रूप में जिले में प्रशासनिक आदेश दिया जाता है, और आमतौर पर, कुछ राज्यों में सेवा के १६ साल की सेवा करने के बाद, एक आईएएस अधिकारी मंडलायुक्त के रूप में राज्य में एक पूरे मंडल का नेतृत्व करता है। सर्वोच्च पैमाने पर पहुंचने पर, आईएएस अधिकारी भारत सरकार के पूरे विभागों और मंत्रालयों की का नेतृत्व करते हैं। आईएएस अधिकारी द्विपक्षीय और बहुपक्षीय वार्ता में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रतिनियुक्ति पर, वे विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोषएशियाई विकास बैंक और संयुक्त राष्ट्र या उसकी एजेंसियों जैसे अंतरसरकारी संगठनों में काम करते हैं। भारत के चुनाव आयोग की दिशा में भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए प्रशासन के विभिन्न स्तरों पर आईएएस अधिकारी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।[14]

राज्य सरकार के कार्मिक विभाग द्वारा उक्त नियमावली के अनुसार सेवा संबंधी मामलों का क्रियान्वयन किया जाता है।पदोन्नति, अनुशासनिक कार्यवाही इत्यादि के सम्बन्ध में भारत सरकार द्वारा ही दिशानिर्देश तैयार की जाती है। इन मामलों पर कार्मिक विभाग द्वारा भारत सरकार को आख्या/रिपोर्ट भेजी जाती है। जिस पर भारत सरकार विचार कर राज्य सरकार (कार्मिक विभाग) को मामलों पर कार्यवाही करने का आदेश देती है। तत्पश्चात् कार्मिक विभाग द्वारा भारत सरकार के आदेशों को जारी कर कार्यवाही की जाती है।

इतिहास

 

ईस्ट इंडिया कंपनी के कब्जे के दौरान, सिविल सेवा को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया – कोंगान्टेड, अनकोवेंटेड और विशेष सिविल सर्विसेज। कोंगान्टेड सेवा, या ईस्ट इंडिया कंपनी की सिविल सेवा (हेइसीसीसीएस), में बड़े पैमाने पर ब्रिटिश सिविल सेवकों की सरकार में उच्च पदों पर कब्जा था। प्रशासन के निचले पायदान पर भारतीयों की प्रविष्टि को सुलझाने के लिए अनकोवेंटेड सिविल सेवा शुरू की गई थी।  विशेष सेवा में भारतीय प्रशासनिक विभाग जैसे भारतीय वन सेवा, भारतीय पुलिस, भारतीय राजनीतिक सेवा आदि शामिल थीं। इन सेवाओं के रैंक विभिन्न तरीकों से भरे गए थे, भारतीय राजनीतिक सेवा अधिकारी आम तौर पर आईएआईसीसीएस/आईसीएस और ब्रिटिश भारतीय सेना से होते थे, भारतीय पुलिस के कई रैंकों में ब्रिटिश भारतीय सेना के अधिकारी थे, लेकिन १८९३ के बाद से, इसके संवर्ग भरने के लिए एक अलग वार्षिक परीक्षा आयोजित की गई।

१८५८ में इंडियन सिविल सर्विस (आईसीएस) द्वारा माननीय ईस्ट इंडिया कंपनी की सिविल सर्विस (आईएचआईसीसीएस) का अधिग्रहण किया गया। आईसीएस १८५८ और १९४७ के बीच की अवधि में ब्रिटिश शासन के दौरान ब्रिटिश भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की सर्वोच्च नागरिक सेवा थी। आईसीएस को ब्रिटिश नियुक्तियों १९४२ में बनाए गए थे।

भारत सरकार अधिनियम, १९१९, भारत के सचिव राज्य की अध्यक्षता वाली इम्पीरियल सर्विसेज के पारित होने के साथ, अखिल भारतीय सेवाएं और केंद्रीय सेवाओं में विभाजित किया गया था।

१९४७ में भारत के विभाजन के समय और अंग्रेजों के प्रस्थान के समय, इम्पीरियल सिविल सर्विस को भारत और पाकिस्तान के नए दलों के बीच विभाजित किया गया था। जिस भाग को भारत गया था उसे भारतीय प्रशासनिक सेवा का नाम दिया गया था, जबकि पाकिस्तान जाने वाले हिस्से को पाकिस्तान की केंद्रीय सुपीरियर सेवा का नाम दिया गया था।

भारतीय संविधान के भाग १५ में अनुच्छेद ३१२ (२) के तहत आधुनिक भारतीय प्रशासनिक सेवा का निर्माण किया गया था।

भारतीय आई ए एस अधिकारी

नाम परीक्षा वर्ष नियुक्ति वर्ष
सत्येंद्र टैगोर १८६३ १८६४
रोमेश दत्त १८६९ १८७१
बिहारी लाल गुप्ता १८६९ १८७१
सुरेंद्रनथ बैनर्जी (बाद में अयोग्य घोषित) १८६९ १८७१
श्रीपाद बाजी ठाकुर १८६९ १८७१
आनंदराम बरुआ १८७० १८७२
कृष्ण गोविंद गुप्ता (बाद में सर) १९७१ १८७३
बृजेंद्रनाथ डे १८७३ १८७५
ज्ञानेंद्रनाथ गुप्ता १८९० १८९२
सतीश चंद्र मुखर्जी १८९० १८९२
अकबर हैदरी (वरिष्ठ) (बाद में सर)    
राजकुमार बैनर्जी (बाद में सर)    
किरण चंद्र डे    
शरत कुमार घोष (बाद में सर) १९०० १९०२
गुरुसहाय दत्त (ranked ७th in Part I and १st in Part II) १९०३ १९०५
एम एस अकबर हैदरी (कनिष्ठ) (बाद में सर) १९१७ १९१९
रामचंद टेकचंद शिवदासानी १९१९ १९२१
सुकुमार सेन १९१९ १९२१
सत्येंद्रनाथ राय    
सुभाष चंद्र बोस (resigned १९२१) (ranked ४th) १९२० १९२१
गिरिजा शंकर बाजपेयी (बाद में सर)    
ज्वाला प्रशाद श्रीवास्तव (बाद में सर)    
बद्रुद्दीन तैयबजी)    
सुशील कुमार डे    
सैबल गुप्ता    
अशोक मित्रा    
निर्मल कुमार मुखर्जी १९४१ १९४३
कुमुद कांत राय    
देबेश दास

 

 

आईएएस अधिकारी की जिम्मेदारियां

एक आईएएस अधिकारी द्वारा किए गए विशिष्ट कार्य हैं:

  • जब क्षेत्रीय पदों पर तैनात किया जाता है जैसे उप-कलेक्टर/मजिस्ट्रेट, अपर जिलाधिकारी, जिलाधिकारी, मंलायुक्त, तब राजस्व के मामलों कोर्ट बनना, राजस्व को इकट्ठा करना, कानून और व्यवस्था बनाए रखना, केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों को ज़मीनी स्तर पर लागू करना और क्षेत्र में सरकार के एजेंट के रूप में कार्य करना, अर्थात जनता और सरकार के बीच मध्यवर्ती के रूप में कार्य करना।
  • संबंधित मंत्रालय या विभाग के मंत्री प्रभारी के परामर्श से नीति के निर्माण और कार्यान्वयन सहित सरकार के प्रशासन और दैनिक कार्यवाही को संभालना
  • केंद्रीय सचिवालय में कैबिनेट सचिव, सचिव, अपर सचिव (अतरिक्त सचिव), संयुक्त सचुव व् राज्य सचिवालय में मुख्य सचिव, अपर मुख्य सचिव/विशेष मुख्य सचिव व् प्रमुख सचिव रहते हुए निति निर्माण में योगदान देना, संबंधित मंत्री व् मंत्रीमंडल से परामर्श करने के बाद।

कैरियर की प्रगति

आईएएस अधिकारी अपने करियर की शुरूआत अपने आवंटित कैडर में जिला प्रशिक्षण से करते हैं। राज्य प्रशासन में, वे उप-जिलाधिकारी (एसडीएम) के रूप में काम करना शुरू कर देते हैं और उन्हें एक जिले के पूरे तहसील का प्रभार दिया जाता है, एसडीएम के रूप में, उन्हें तहसीलके कानून-व्यवस्था बनाए रखने का प्रभार सौंपा जाता है, कानून-व्यवस्था के साथ-साथ उन्हें तहसील के सामान्य प्रशासन और विकास कार्यों के भी प्रभारी बनाया जाता है। जिला प्रशिक्षण के बाद आईएएस अधिकारी तीन महीने की अवधि के लिए केंद्र सरकार में सहायक सचिवों के रूप में कार्यरत होते हैं। आईएएस अधिकारियों ने राज्य और केंद्र सरकारों में विभिन्न सामरिक पदों पर और स्थानीय-स्व-सरकारों (नगर निगम / जिला परिषदों) और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में भी कार्यरत किया।

भारतीय वन सेवा

भारतीय वन सेवा (भाविसे) एक को तीन अखिल भारतीय सेवा के अन्य दो की जाने वाली भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा की है। भाविसे 1966 में अखिल भारतीय सेवा अधिनियम 1951 के तहत बनाया गया था। बहरहाल, यह एक अच्छी तरह से आयोजित भारतीय वन सेवा, जो ब्रिटिश राज के दौरान 1863से 1935 के अस्तित्व का केवल एक पुनरुद्धार किया गया। भाविसे अधिकारियों की औपचारिक प्रशिक्षण की शुरुआत वापस 1867 के लिए जब पाँच उम्मीदवारों फ्रांस और जर्मनी में प्रशिक्षण से गुजरना करने के लिए चयन किया गया तिथियाँ. यह 1885 के लिए फ्रांस और रूस के बीच युद्ध के कारण एक छोटी तोड़ने के अलावा को जारी रखा. 1885 1905 तक, भाविसे परिवीक्षार्थी के प्रशिक्षण कूपर के हिल, लंदन, जहां 173 अधिकारियों को प्रशिक्षित किया गया पर आयोजित किया गया। 1895 और 1927 के बीच भाविसे परिवीक्षार्थी का प्रशिक्षण, ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज और एडिनबर्ग के विश्वविद्यालयों में आयोजित की गई थी। 1920 में, भारत सरकार, प्रशिक्षण भारत में 1926 में शुरू की भाविसे परिवीक्षार्थी एक केंद्र और वन अनुसंधान संस्थान की स्थापना करने के लिए परिणामी देहरादून में स्थित है कि प्रशिक्षित किया जा सकता है कि ऐतिहासिक फैसला लिया। यह 1932 है, जब अधिकारियों के लिए मांग की कमी के कारण, यह था बंद होने तक जारी रहा. भारत अधिनियम 1935 की है, जो अनंतिम सूची में वानिकी हस्तांतरित की सरकार है, भाविसे प्रशिक्षण की समाप्ति के परिणामस्वरूप. भाविसे अधिकारियों की सेवानिवृत्ति के साथ, प्रशिक्षित foresters की माँग को और इस प्रकार भारतीय वन कालेज 1938 में पैदा हुआ था उत्पन्न हो. इस Superior वन सेवा अधिकारी, विभिन्न राज्यों से भर्ती, IFC में इस प्रकार की सेवा के सब भारत चरित्र बनाए रखने प्रशिक्षित किया गया। इस सेवा का मुख्य जनादेश वनों के प्रबंधन मुख्यतः लकड़ी के उत्पादों के लिए एक निरंतर आधार पर यह दोहन करने के लिए वैज्ञानिक था। यह इस समय आ गया है कि जंगल के बड़े tracts स्थिति नियंत्रण में आरक्षण की प्रक्रिया के माध्यम से भारतीय वन अधिनियम, 1927 के अंतर्गत लाया गया के दौरान किया गया।

जंगल के प्रबंधन की प्रांतीय सरकार के हाथों में 1935 में और वन विभाग ने संबंधित राज्य सरकारों के तहत देश के वन प्रबंध कर रहे हैं आज भी चली गई। वानिकी के विषय के बाद से वर्ष 1977 में समवर्ती सूची में स्थानांतरित किया गया, केन्द्र सरकार ने वन के प्रबंधन की नीति के स्तर पर विशेष रूप से एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

ब्रिटिश काल में के रूप में लकड़ी के उत्पादों के उत्पादन के लिए वनों के प्रबंधन का मुख्य जोर भी 1976 में कृषि पर राष्ट्रीय आयोग की सिफारिशों में 1966.The भाविसे के पुनर्गठन के बाद जारी वन प्रबंधन में एक मील का पत्थर पारी थी। यह पहली बार है कि लोगों की धारणा के बायोमास की जरूरत है और सामाजिक वानिकी के माध्यम से विस्तार गतिविधियों को संबोधित में ध्यान रखा गया था करने के लिए शुरू की गई थी। निरंतर उपज की अवधारणा के लोगों में और वन क्षेत्रों के आसपास रहने की जरूरत है बायोमास के साथ अग्रानुक्रम में संबोधित किया। बराबर का प्रबंधन करने के लिए जोर वास संरक्षित क्षेत्र में दिया गया था और देश की जैव विविधता संरक्षण. आज वहाँ पर 2700 भाविसे अधिकारियों ने देश में सेवा कर रहे हैं। राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों के विभिन्न मंत्रालयों और संस्थाओं दोनों में राज्य और केन्द्र सरकार में काम देश के प्राकृतिक संसाधनों, उनमें से एक अच्छी संख्या में प्रबंध में 31 वन विभागों की सेवा के अलावा.

संघ लोक सेवा आयोग (संघ लोक सेवा आयोग), भारत सरकार के अधीन एक शरीर, एक प्रतियोगी परीक्षा विज्ञान की पृष्ठभूमि के साथ स्नातकों के लिए खुला आयोजित द्वारा भाविसे अधिकारियों रंगरूटों. लिखित परीक्षा योग्यता के बाद, उम्मीदवारों, दिल्ली प्राणी उद्यान में चार घंटों में पुरुषों और महिलाओं के लिए 14 किमी के लिए (25 किमी पैदल एक परीक्षण एक साक्षात्कार से गुजरना करने के लिए) और एक मानक चिकित्सा स्वास्थ्य परीक्षण किया है। चयनित अधिकारियों की शैक्षिक पृष्ठभूमि में वर्तमान रुझान स्नातकोत्तर विज्ञान, इंजीनियरिंग, कृषि और वानिकी सहित उच्च योग्यता को दर्शाता है। अधिकारियों का एक काफी बड़ी संख्या में विभिन्न विषयों में स्नातकोत्तर हैं।

भारतीय पुलिस सेवा

भारतीय पुलिस सेवा, जिसे आम बोलचाल में भारतीय पुलिस या आईपीएस, के नाम से भी जाना जाता है, भारत सरकार के अखिल भारतीय सेवा के एक अंग के रूप में कार्य करता है, जिसके अन्य दो अंग भारतीय प्रशासनिक सेवा या आईएएस और भारतीय वन सेवा या आईएफ़एस हैं जो ब्रिटिश प्रशासन के अन्तर्गत इंपीरियल पुलिस के नाम से जाना जाता था।

भारतीय पुलिस सेवा की परीक्षा संघ लोक सेवा आयोग, दिल्ली (UPSC) द्वारा प्रत्येक वर्ष मई से आरम्भ होकर जनवरी तक आयोजित की जाती है। जिसका उद्देश्य विभिन्न प्रकार के भारतीय पुलिस पदो को भरना है। और जिसमें प्रत्येक वर्ष हजारों की संख्या मैं युवा परीक्षा देते हैं जिसमे से की श्रेष्ठ युवा को इस पद के लिए चुना जाता हैं।

भारतीय पुलिस सेवा ( आई.पी.एस. (IPS) ) में चयन सिविल सेवा परीक्षा (प्रत्येक वर्ष संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित) के द्वारा होता है। इस पद की समाज में प्रतिष्ठा को देखते हुए देश के लाखों युवाओं के बीच इसके प्रति जबरदस्त आकर्षण है। जिसके वजह से देश के लाखों युवा इस परीक्षा में शामिल होते हैं लेकिन अन्तिम चयन में कुछ मेहनती और प्रतिभाशाली छात्र ही स्थान बना पाते हैं। भारतीय पुलिस सेवा में अभ्यर्थी का चुनाव परीक्षा में उसके अंक और उसके द्वारा दी गयी पदो की वरीयता के हिसाब से होता है। इस सेवा के साथ चुनौतियाँ और उत्तरदायित्व जुड़े हुए हैं, इसलिए संघ लोक सेवा आयोग ऐसे अभ्यर्थी का चुनाव करता है जो इस सेवा के अनुकूल हो। आई.पी.एस में चुने हुए अभ्यर्थी का प्रशिक्षण सरदार बल्लभभाई पटेल नेशनल पुलिस एकेडमी, हैदराबाद में होती है। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद अभ्यर्थी को जो राज्य कैडर दिया जाता है, उस राज्य के किसी जिले के पुलिस अधीक्षक के कार्यालय में एक साल की कार्य प्रशिक्षण लेनी होती है। इसके बाद सहायक पुलिस अधीक्षक के रूप में दो वर्ष तक कार्य करने होते है। सहायक पुलिस अधीक्षक के रूप में कार्य करते हुए, अधिकारी के उत्तरदायित्व पुलिस उपाधीक्षक के समकक्ष होती है। अपराध को रोकना और उसका पता लगाना प्रमुख कार्य है। सहायक पुलिस अधीक्षक के रूप में कार्य करते हुए अपने वरीय अधिकारी पुलिस अधीक्षक, वरीय पुलिस अधीक्षक, उप पुलिस महानिरीक्षक के प्रति जवाबदेही होती है। पदोन्नति के द्वारा आई.पी.एस अधिकारी सहायक पुलिस अधीक्षक से पुलिस महानिदेशक पद तक पहुँच सकता है। पुलिस महानिदेशक राज्य पुलिस बल का मुखिया होता है। साथ ही आई.पी.एस अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर भारत सरकार के खुफिया विभाग इंटेलिजेन्स ब्यूरो (आई.बी) और सी.बी.आई में जाते है। दिल्ली, मुम्बई और कोलकता जैसे शहरों में, कानून और व्यवस्था को बनाये रखना पुलिस बल की विशेष जिम्मेदारी है। इन शहरों में पुलिस अधिकारी को सहायक पुलिस आयुक्त, अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त, पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) संयुक्त पुलिस आयुक्त और पुलिस आयुक्त (सीपी) कहा जाता है। पुलिस आयुक्त इन शहरों के पुलिस बल का प्रमुख होता है।

कैरिअर की प्रगति

आईपीएस अधिकारी अपना करियर सहायक पुलिस अधीक्षक के रूप में शुरू करते हैं।

  • पुलिस महानिदेशक “DGP” – डीजीपी भारत में किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में सर्वोच्च रैंकिंग वाला पुलिस अधिकारी होता है। वे राज्य पुलिस के प्रमुख के पद पर तैनात हैं । डीजीपी रैंक के अधिकारियों की अन्य पोस्टिंग अग्निशमन विभाग के प्रमुख, जेल प्रमुख हैं, आपराधिक जांच विभाग के प्रमुख । यदि किसी राज्य कैडर में डीजीपी रैंक के एक से अधिक अधिकारी हैं, तो सबसे वरिष्ठ अधिकारी को राज्य पुलिस के प्रमुख के रूप में नियुक्त किया जाता है और अन्य अधिकारियों को पुलिस विभाग के बाहर अन्य विभागों में डीजीपी के रूप में तैनात किया जाता है। इसका उदाहरण भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के महानिदेशक, अग्निशमन बल के महानिदेशक, जेल विभाग के महानिदेशक, अपराध शाखा सीआईडी के महानिदेशक आदि की नियुक्ति है।
  • पुलिस अपर महानिदेशक “ADG” – यह एक वरिष्ठ अधिकारी का पद है इस रैंक में वे राज्य पुलिस की विशेष इकाइयों जैसे खुफिया, कानून और व्यवस्था, अपराध शाखा, सशस्त्र पुलिस, पुलिस पशिक्षण, आदि के प्रमुख होते हैं
  • पुलिस महानिरीक्षक “IG” – इस पद पर वह कई पुलिस रेंजों वाले एक पुलिस ज़ोन का प्रमुख होता है।यह एक वरिष्ठ पद है और वे विभिन्न विशेष इकाइयों में भी तैनात होते हैं
  • पुलिस उपमहानिरीक्षक “DIG” – इस रैंक में वे पुलिस रेंज के प्रमुख होते हैं, जिसमें कई पुलिस जिले शामिल होते हैं यह एक वरिष्ठ पद है और वे विभिन्न विशेष इकाइयों में भी तैनात होते हैं
  • वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक “SSP” – एसएसपी को आम तौर पर बड़े शहरों या महानगरीय क्षेत्रों में पुलिस जिलों का प्रमुख नियुक्त किया जाता है। यह चयन ग्रेड पद है
  • पुलिस अधीक्षक “SP” – एसपी को आमतौर पर पुलिस जिलों का प्रमुख नियुक्त किया जाता है
  • अपर पुलिस अधीक्षक “Addl.SP” – अतिरिक्त. एसपी को आम तौर पर पुलिस उप-विभागों का प्रमुख नियुक्त किया जाता है या किसी जिले में पुलिस संचालन की देखरेख में एसपी की सहायता की जाती है।
  • सहायक पुलिस अधीक्षक (एएसपी) “ASP” – यह आईपीएस अधिकारियों के लिए प्रवेश स्तर की रैंक है। एएसपी को आमतौर पर उप-विभागीय पुलिस अधिकारी के रूप में तैनात किया जाता है। वे उपखंड के अंतर्गत कई पुलिस थानों के कामकाज की निगरानी करते हैं। यह रैंक पुलिस उपाधीक्षक के समकक्ष है

केन्द्रीय सिविल सेवा

केंद्रीय सेवाएं, केंद्रीय सरकार के प्रशासन के साथ संबंधित हैं। यह विदेशी मामलों, रक्षा, आयकर, सीमा शुल्क, पदों और तार, आदि जैसे विषयों के साथ संबंधित हैं। इन सेवाओं के अधिकारी केन्द्रिय सरकार के अधिकारियों द्वारा भर्ती किए जाते हैं।

ग्रुप “ए

  • भारतीय विदेश सेवा, ग्रुप ‘ए’.
  • भारतीय आयुध निर्माणी सेवा ग्रुप ‘ए’.
  • भारतीय आयुध निर्माणी स्वास्थ्य सेवा ग्रुप ‘ए’.
  • केंद्रीय सचिवालय सेवा ग्रुप ‘ए’ (ग्रेड चयन और ग्रेड I अधिकारियों)
  • पुरातत्व सेवा, ग्रुप ‘ए’.
  • भारतीय वानस्पतिक सर्वेक्षण, ग्रुप ‘ए’.
  • केंद्रीय इंजीनियरिंग सेवा (सिविल) ग्रुप ‘ए’.
  • केंद्रीय इंजीनियरिंग (इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल) ग्रुप ‘ए’ सेवा.
  • केन्द्रीय स्वास्थ्य सेवा, ग्रुप ‘ए’.
  • केंद्रीय राजस्व रासायनिक सेवा, ग्रुप ‘ए’.
  • सामान्य केंद्रीय सेवा, ग्रुप ‘ए’.
  • भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, ग्रुप ‘ए’.
  • भारतीय लेखा परीक्षा और लेखा सेवा, ग्रुप ‘ए’.
  • भारतीय सिविल लेखा सेवा.
  • भारतीय रक्षा लेखा सेवा
  • भारतीय मौसम सेवा, ग्रुप ‘ए’.
  • भारतीय डाक सेवा, ग्रुप ‘ए’.
  • भारतीय डाक और टेलीग्राफ यातायात सेवा, ग्रुप ‘क’.
  • भारतीय राजस्व सेवा, ग्रुप ‘ए’ (सीमा शुल्क शाखा, केन्द्रीय उत्पाद शुल्क शाखा और आयकर शाखा)
  • भारतीय नमक सेवा, ग्रुप ‘ए’.
  • व्यापारिक समुद्री प्रशिक्षण पोत सेवा, ग्रुप ‘ए’.
  • खान सुरक्षा महानिदेशालय, ग्रुप ‘ए’ .
  • विदेशी संचार सेवा, ग्रुप ‘ए’.
  • सर्वे ऑफ इंडिया, ग्रुप ‘ए’.
  • भारतीय दूरसंचार सेवा, ग्रुप ‘ए’.
  • भारत की जूलॉजिकल सर्वे, ग्रुप ‘ए’.
  • भारतीय सिविल सेवा फ्रंटियर, ग्रुप ‘ए’ (ग्रेड-I और ग्रेड II अधिकारी)
  • केंद्रीय न्यायिक सेवा (ग्रेड I, II, III और IV)
  • रेलवे निरीक्षणालय सेवा, ग्रुप ‘ए’
  • भारतीय विदेश सेवा, शाखा (बी) (पूर्व) – (सामान्य संवर्ग, ग्रेड I और सामान्य संवर्ग, ग्रेड II)
  • दिल्ली तथा अंडमान और निकोबार द्वीप ग्रुप सिविल सेवा, ग्रेड I.
  • दिल्ली और अंडमान और निकोबार द्वीप पुलिस सेवा, ग्रेड II.
  • भारतीय निरीक्षण सेवा, ग्रुप ‘ए’
  • भारतीय आपूर्ति सेवा, ग्रुप ‘ए’
  • केन्द्रीय सूचना सेवा (चयन ग्रेड, वरिष्ठ प्रशासनिक ग्रेड, जूनियर प्रशासनिक ग्रेड, ग्रेड I और ग्रेड II)
  • भारतीय सांख्यिकी सेवा
  • भारतीय आर्थिक सेवा
  • टेलीग्राफ यातायात सेवा, ग्रुप ‘ए’
  • केन्द्रीय जल अभियांत्रिकी सेवा, ग्रुप ‘ए’
  • सेंट्रल पावर इंजीनियरिंग सर्विस, ग्रुप ‘ए’
  • कंपनी लॉ बोर्ड सेवा
  • केंद्रीय पूल के श्रम अधिकारियों, ग्रुप ‘ए’
  • केंद्रीय इंजीनियरिंग सेवा (सड़क), ग्रुप ‘ए’
  • भारतीय डाक और टेलीग्राफ लेखा और वित्त सेवा, ग्रुप ‘ए’
  • भारतीय प्रसारण (इंजीनियर्स) सेवा
  • केंद्रीय व्यापार सेवा, ग्रुप ‘ए’
  • सशस्त्र बलों के मुख्यालय सिविल सेवा (ग्रुप ‘ए’)
  • केंद्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा (ग्रुप ‘ए’)

ग्रुप “बी

  • केंद्रीय सचिवालय सेवा, ग्रुप ‘बी’ (धारा और ‘सहायक ग्रेड अधिकारी)
  • केंद्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा, ग्रुप ‘बी’
  • केंद्रीय सचिवालय आशुलिपिक सेवा, (ग्रेड I, ग्रेड II और चयन ग्रेड अधिकारी)
  • केन्द्रीय स्वास्थ्य सेवा, ग्रुप ‘बी’
  • भारतीय मौसम सेवा, ग्रुप बी
  • डाक अधीक्षकों ‘सेवा, ग्रुप’ बी ‘
  • पोस्टमास्टर सेवा, ग्रुप’ बी ‘
  • टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग सेवा, ग्रुप ‘बी’
  • भारतीय डाक और टेलीग्राफ लेखा और वित्त सेवा, ग्रुप ‘बी’ दूरसंचार विंग.
  • भारतीय डाक एवं टेलीग्राफ लेखा एवं वित्त सेवा, डाक विंग, ग्रुप ‘बी’
  • तार यातायात सेवा, ग्रुप बी
  • केन्द्रीय उत्पाद शुल्क सेवा, ग्रुप ‘बी’
  • मूल्यांक सीमा शुल्क सेवा, ग्रुप ‘बी’ (प्रधान मूल्यांक और मुख्य मूल्यांक)
  • सीमा शुल्क निवारक सेवा, ग्रुप ‘बी’ – (मुख्य निरीक्षक)
  • रक्षा सचिवालय सेवा
  • केंद्र शासित प्रदेश प्रशासनिक सेवा
  • केंद्र शासित प्रदेश पुलिस सेवा

राज्य सिविल सेवा

राज्य सिविल सेवा परीक्षाओं और भर्ती का आयोजन भारत के व्यक्तिगत राज्यों द्वारा की जाती है। राज्य सिविल सेवा भूमि राजस्व, कृषि, वन, शिक्षा आदि जैसे विषयों के साथ जुड़ी है। राज्य नागरिक सेवाओं के अधिकारियों की भर्ती विभिन्न राज्यों द्वारा राज्य लोक सेवा आयोगों के माध्यम से की जाती है। राज्य सेविल सेवा (एससीएस) परीक्षा के माध्यम से चयनित किए गए छात्रों की निम्नलिखित सेवाओं की श्रेणी है।:

  • राज्य सिविल सेवा, क्लास-I (पी.सी.एस) प्रावेन्सियल सिविल सर्विस
  • राज्य पुलिस सेवा, क्लास-I (पी.पी.एस) प्रावेन्सियल पुलिस सर्विस
  • ब्लॉक डेवलपमेंट अधिकारी.
  • राजस्व (प्रशासनिक) सेवा
  • तहसीलदार / तालुकदार / सहायक कलेक्टर.
  • उत्पाद शुल्क और कराधान अधिकारी.
  • रोजगार अधिकारी जिला.
  • खजाना अधिकारी जिला.
  • जिला कल्याण अधिकारी.
  • सहायक रजिस्ट्रार सहकारी सोसायटी.
  • जिला खाद्य एवं आपूर्ति अधिकारी / नियंत्रक.
  • किसी भी अन्य क्लास-I/क्लास-II सेवा नियमों के अनुसार संबंधित राज्य द्वारा अधिसूचित.

 

अन्य

सिविल सेवा दिवस

सिविल सेवा दिवस 21 अप्रैल को मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य नागरिकों के लिए अपने आप को एक बार पुनः समर्पित और फिर से वचनबद्ध करना है। इसे सभी सिविल सेवा द्वारा मनाया जाता है। यह दिन सिविल सेवकों को बदलते समय के चुनौतियों के साथ भविष्य के बारे में आत्मनिरीक्षण और सोचने का अवसर प्रदान करता है।

इस अवसर पर, केन्द्रिय और राज्य सरकारों के सभी अधिकारियों को भारत के प्रधानमंत्री द्वारा सार्वजनिक प्रशासन में उत्कृष्ठता के लिए सम्मानित किया जाता है। ‘लोक प्रशासन में उत्कृष्टता के लिए प्रधानमंत्री पुरस्कार तीन श्रेणियों में प्रस्तुत किया जाता है। पुरस्कारों की इस योजना के तहत 2006 में गठन किया गया, व्यक्तिगत रूप से या ग्रुप के रूप में या संगठन के रूप में सभी अधिकारी इसके पात्र हैं।

पुरस्कार में एक पदक, स्क्रॉल और रू 1 लाख की नकद राशि भी शामिल है। एक ग्रुप के मामले में कुल पुरस्कार राशि 5 लाख रुपए है, प्रति व्यक्ति अधिकतम 1 लाख रूपए का भागीदार होता है। किसी संगठन के लिए नकद राशि 5 लाख रूपये तक सीमित है।

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