प्रयोगवाद और नयी कविता
विषय सूची
- प्रस्तावना
- प्रयोगवाद
- प्रयोगवाद के वैचारिक सिद्धांत
- प्रयोगवाद से नई कविता के संबंध की पहचान
- नई कविता के नामकरण के नए अर्थ वृत्त
- सारांश
प्रस्तावना
आधुनिक हिंदी साहित्य में स्वाधीनता प्राप्ति के आसपास की नई काव्य-चेतना को व्यापक अर्थों और संदर्भो में ‘प्रयोगवाद और नयी कविता’ के नाम से संबोधित किया गया है। यह काव्य आंदोलन अनेक तरह की विचारधाराओं, जीवन-मूल्यों, सामाजिक-राजनीतिक आघातों के सामाजिक यथार्थ से उत्पन्न हुआ। यह काव्य आंदोलन रचना-प्रक्रियाओं की विभिन्न शैलियों को अपने में अभिन्न रूप से आत्मसात करता हुआ रचनात्मक विकास की अनेक दिशाओं में विकसित होता रहा।
स्वाधीनता प्राप्ति के बाद देश में नव-निर्माण और ब्रिटिश साम्राज्यवाद की दासता की जंजीरों से मुक्त होने का उल्लास था। किंतु इस उल्लास के भीतर एक घनीभूत पीड़ा भी व्याप्त थी कि राजनीतिक स्वतंत्रता के आने पर भी देश सामाजिक-आर्थिक रूप से साम्राज्यवादी चंगुल से मुक्त होगा अथवा नहीं। भारत के सामने जो विश्व था वह द्वितीय विश्व युद्ध की मार से घायल, क्षत-विक्षत, भयावह आकृतियों वाला विश्व था जिस पर शीत युद्ध के बादल घिर रहे थे। इस विश्व से हम अलग न रह सकते थे। हम सभी का अनुभव था कि द्वितीय विश्व युद्ध की भंयकर विभीषिकाओं ने अपने प्रभाव-दबाव से विश्व भर में एक पुराने संसार को नष्ट कर दिया है। हालत यह हो गई कि पुराने मूल्यों और मान्यताओं पर या तो प्रश्न-चिहन लगा दिया गया या उन्हें इस रूप में बदलाव की तीव्र प्रक्रिया के भीतर से गुजरना पड़ा कि उन्हें मूल रूप में पहचानना कठिन हो गया था।
प्रयोगवाद और नयी कविता, सामान्य और विशिष्ट, दोनों अर्थों में अपने से पहले की कविता से विद्रोह करती कविता है। छायावाद और प्रगतिवाद की बहुत-सी मान्यताएँ और कसौटियाँ या तो अमान्य घोषित कर दी गईं या फिर उन्हें संशोधन और परिष्कार के साथ आत्मसात कर लिया गया। यह परिवर्तन इतनी प्रबल गति से घटित हुआ कि कविता की प्रेरणाभूमि, उपकरण, विचारधारा, कथ्य और अंतर्दृष्टि से लेकर अभिव्यंजना के माध्यमों (भाषा, बिंब, प्रतीक, मिथक, उपमान, भंगिमा, लय, छंद, शैली) में तो आया ही, . कविता के उद्देश्य और आधारों में भी एक बड़ी क्रांतिकारी हलचल उपस्थित हई।
कविता का उद्देश्य आनंद या मुग्ध कर लेना मात्र नहीं रहा – कविता का उद्देश्य हो गया आदमी का संपूर्णता में अपने समय और समाज के यथार्थ से साक्षात्कार। नई प्रश्नाकुलताओं और चुनौतियों के कारण परंपरा और आधुनिकता के प्रति रवैया, नया प्रस्तावित हुआ। नई बौद्धिकता का संदर्भ, विचारधारात्मक संघर्ष और । प्रतिबद्धता का प्रश्न, राजनीति और धर्म के बदलते रिश्ते, व्यक्ति-स्वातंत्र्य, व्यवस्था-विरोध और अस्वीकार के साहस के रूप में सामने आया।
सन् 1940 से लेकर 1970 तक के तीन दशक भारत के लिए ही नहीं विश्व साहित्य के लिए वैचारिक संघर्ष की दृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण रहे। संस्कृति, लोकतंत्र और स्वतंत्रता के नाम पर पूँजीवादसाम्राज्यवाद की विचारधारा ने एक जाल फेंका कि तीसरी दुनिया के देश उनके चंगुल से बाहर रहकर पनप न सकें। नई राजनीति से शीत युद्ध का खतरा पनपने लगा। नयी कविता पर इन खतरों की छाया देखकर नई कविता के सर्वाधिक समर्थ भाष्यकार, विचारक और कवि ग.मा. मुक्तिबोध सकते में आ गए। उन्होंने पूरी स्थिति को समझाते हुए लिखा है – “स्वाधीनता प्राप्ति के उपरान्त भारत में एक और अवसरवाद की बाढ़ आई। शिक्षित मध्य वर्ग में भी उसकी जोरदार लहरें पैदा हुईं। साहित्यिक लोग भी उसके प्रवाह में बहे और खूब ही बहे। इस भ्रष्टाचार, अवसरवाद, स्वार्थपरता की पार्श्वभूमि में, नयी कविता के क्षेत्र में पुराने प्रगतिवाद पर जोरदार हमले किए गए और कुछ सिद्धातों की एक रूपरेखा प्रस्तुत की गई।
ये सिद्धान्त और उसके हमले, वस्तुतः उस शीत युद्ध के अंग थे जिसकी प्रेरणा लन्दन और वाशिंगटन से ली गई थी। पश्चिम की परिपक्व मानवतावादी परंपरा से साहित्यिक प्रेरणा ग्रहण न करके उन पर नए व्याख्याताओं ने उसकी अत्यंत प्रतिक्रियावादी साहित्यिक विचारधारा को अपनाया और फैलाया। नयी कविता के आसपास लिपटे हुए बहुत से साहित्यिक सिद्धांतों में शीत युद्ध की छाप है।’ (नयी कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध)।
‘प्रयोगवाद और नयी कविता में कलावाद या कला की ऑटोनॉमी को, कला के स्वायत्त संसार को इस ढंग से जमाने का प्रयास ही कवि मुक्तबोध की चिन्ता का विषय बना है। कलावादियों को डर लगता था कि वे परिवर्तनकारिणी प्रवृत्तियाँ कहीं नयी कविता में न उभरने लगें। इसलिए ऐसी प्रवृत्तियों की साहित्यिक अभिव्यक्तियों के और अधिक प्रभावशाली एवं सुन्दर ढंग से बनने की अगली संभावनाओं के विरोध में उन्होंने यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया जिसमें कला की स्वायत्त निर्विकल्पकता की स्थापना की गई और इस प्रकार नयी कविता को जीवन के मूल तथ्यों से अलग करने का प्रयत्न किया गया। आधुनिक भावबोध वाले सिद्धान्तों, जन-साधारण के उत्पीड़न के अनुभवों, उग्र विक्षोभों और मूल उद्वेगों का बॉयकाट किया गया। लघुमानव’ वाला सिद्धान्त लाकर जन-साधारण की मार्मिक आध्यात्मिक शक्तियों और भव्यताओं से आँखें फेर ली गईं।
मुक्तिबोध ने नयी कविता आंदोलन की राजनैतिक व्याख्या तो की ही नयी कविता के सांस्कृतिकसौंदर्यात्मक, मनोविश्लेषणात्मक और साहित्यिक पहलुओं का विस्तार से अध्ययन भी प्रस्तुत किया। किंतु मुक्तिबोध और उनकी विचारधारा से असहमत नयी कविता के बहुत से कवि आलोचकों ने मार्क्सवाद का खण्डन करते हुए उसे एक प्रकार का अधिनायकवाद कहा जिसमें ‘व्यक्ति स्वातंत्र्य’ के लिए जगह ही कहाँ है। नयी कविता में नेहरू-युग से मोहभंग की पीड़ा व्यापक स्तर पर व्यक्त हुई। जयप्रकाश नारायण और लोहिया का समाजवादी दर्शन इस दौड़ में जनता की ‘आस्था’ का पर्याय बना और नई कविता का एक बड़ा कवि समूह लोहियावादी विचारधारा से प्रभावित हुआ । लक्ष्मीकांत वर्मा, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय, विजयदेव नारायण साही आदि की विचारधारा पर न अमरीकी पूँजीवादी-साम्राज्यवादी विचारधाराओं का असर है न मार्क्सवादी विचारधारा का।
गांधी के विचारों का नया संशोधित संस्करण बनकर राममनोहर लोहिया आए और नई कविता का सहज मानव (जिसे विजयदेवनारायण साही और लक्ष्मीकांत वर्मा ने ‘लघु मानव’ नाम दिया) इसी भाव-बोध की हिंदस्तानी उपज है। नयी कविता, इसी अर्थ में सहज मानव या सामान्य मानव के व्यापक परिवेश से जन्मी तनाव और संधर्ष की अभिव्यक्ति देने वाली कविता है – जो साधारण आदमी की असाधारणता में विश्वास करती है, महामानवों की। छद्म आदर्शवादिता में नहीं । मार्क्सवादी, अस्तित्ववादी, मनोविश्लेषणवादी, अतियथार्थवादी, यथार्थवादी, क्षणवादी जैसी तमाम विचारधाराओं का प्रयोगवाद और नयी कविता पर वस्तु और रूप के स्तर पर प्रभाव है, पर ‘प्रयोगवाद और नयी कविता’ किसी भी विचारधारा की गुलामी स्वीकार नहीं करती हैं।
प्रयोगवाद
आधुनिक हिंदी कविता में प्रयोगवाद’ का जन्म छायावाद की अतिशय अशरीरी कल्पना, सूक्ष्मतावादी सौंदर्य-बोध और एकांगिता के विरोध से हुआ। ऐतिहासिक दृष्टि से प्रयोगवाद’ का आरम्भ अज्ञेय के सम्पादकत्व में निकलने वाले काव्य संग्रह ‘तारसप्तक’ से हुआ। ‘तारसप्तक’ में विविध विचारधाराओं के कवि एक साथ एकत्रित हुए जिनमें अज्ञेय को छोड़कर ज्यादातर कवि प्रगतिशील विचाराधारा के समर्थक थे। किंतु प्रयोगवाद नाम इस काव्य-प्रवृत्ति के विरोधियों द्वारा दिया गया है।
‘प्रयोगवाद’ के कवियों ने ‘प्रगतिवाद’ पर दो आरोप साफ तौर पर लगाए –
- प्रगतिवाद, साहित्य का संकीर्णतावादी आंदोलन है जिसमें रचनाकार की स्वतंत्रता का अपहरण किया जाता है; और
- प्रगतिवाद, विषय-वस्तु पर अत्यधिक बल देकर विचारधारा की नारेबाजी का फार्मूला अपनाता है।
इसमें साहित्य की कलात्मकता औ रूप-विधान की भयंकर उपेक्षा होती है। अज्ञेय ने ‘प्रगतिवाद’ से असंतुष्ट होकर ‘व्यक्ति स्वातंत्र्य सिद्धान्त की स्थापना का अभियान प्रयोगवाद’ में चलाया। प्रगतिशील साहित्य में साहित्येतर मूल्यों को स्थान मिल था- किंतु ‘प्रयोगवाद’ साहित्यिक मूल्यों को केन्द्र में रखकर आगे बढ़ा । फलतः ‘प्रयोगवाद’ के अतिवाद से बचने के चक्कर में ‘प्रयोगवाद’ स्वयं अपने ही अंतर्विरोधों-अतिवादों का शिकार होकर रूपवाद (फार्मलिज्म) के जाल में फंसता गया जिससे उसे मुक्ति नयी कविता आंदोलन में मिली।
इसी समय काव्य में ‘प्रयोग’ को आधार बनाकर एक आंदोलन नकेनवादियों या प्रपद्यवादियों ने खड़ा कर दिया। ‘प्रयोग’ शब्द अंग्रेजी के ‘एक्सपेरीमेण्ट’ का हिंदी पर्याय है और इसका संबंध विज्ञान के ‘प्रयोग’ से न होकर आधुनिक चित्रकला के ‘प्रयोग’ से है। आधुनिक चित्रकला के प्रवर्तक चित्रकार सेजा ने अपने चित्रों को ‘प्रयोग’ कहा – फिर क्या था कि चित्रकला से यह ‘प्रयोग’ शब्द साहित्य में आया और चल पड़ा। अन्यथा ‘प्रयोग’ या ‘प्रयोगवाद’ का ‘एक्सपेरीमेन्टलिज्म’ जैसा कोई समानांतर आधार पश्चिम में भी नहीं है। नकेनवादियों ने ‘प्रयोग’ को काव्य में साध्य और साधन, दोनों घोषित किया। लेकिन ‘प्रयोगवाद’ के काफी पीछे ‘नकेनवाद’ आंदोलन चला।
नकेनवादी काव्य “प्रपद्यद्वादश-सूत्री” तथा “फक्किका” के साथ छपकर आया और अंत में “पस्पशा” के अंतर्गत “प्रयोगवाद” का वास्तविक आरंभ नलिन जी की कविताओं से घोषित किया गया। इसमें “प्रयोग दश सूत्री” देकर अज्ञेय जी के विचारों की खुली आलोचना की गई तथा “दो सूत्र” कहते हैं कि
- “प्रयोगवाद सर्वतंत्र स्वतंत्र है;
- उसके लिए शास्त्र या बल निर्धारण नियम अनुपयुक्त है।”
लेकिन बिहार की भूमि से उठा यह काव्य-आंदोलन शेष हिंदी क्षेत्रों में मान्यता प्राप्त नहीं कर सका । नकेनवाद का ‘भाव और व्यंजना स्थापत्य तथा “प्रपद्यवाद की दार्शनिक पृष्ठभूमि” को ये रचनाकार स्वयं स्पष्ट नहीं कर सके । नतीजा यह हुआ कि काव्य-आंदोलन एकदम किनारे पड़कर विलुप्त हो गया ।
प्रयोगवाद के वैचारिक सिद्धांत
“प्रयोगवाद” के प्रवर्तन का सच्चा श्रेय अज्ञेय जी को ही मिला और इस कविता के स्वरूप को जानने के लिए “तारसप्तक” (1943) ‘दूसरा सप्तक” (1951) और “तीसरा सप्तक” (1959) को आधार बनाया। जाता है। अज्ञेय ने “चौथा सप्तक” भी निकाला पर इसे “उपेक्षित” कहकर नकार दिया गया। सम्पादक ने न केवल इक्कीस कवियों को एकत्र किया बल्कि हर कवि ने अपने काव्य पर “वक्तव्य” भी दिए। सच है कि “तारसप्तक” के सात कवि हैं – गजानन माधव मुक्तिबोध, नैमिचन्द्र जैन, भारत भूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, गिरिजा कुमार माथुर, राम विलास शर्मा और अज्ञेय । संकलनकर्ता और संपादक अज्ञेय को “तारसप्तक” से सम्मान और विवाद मिला। “तारसप्तक” की भूमिका की वे स्थापनाएँ जो विवाद के केन्द्र में रही हैं, इस प्रकार हैं :
- “विविध नई प्रवृत्तियों को संकेतित किया कवि का युग संबंध सदा के लिए बदल गया था। सभी कवि अपने को अपने समय से एक नए ढंग से बाँध रहे थे।”
- “कुछ के लिए आधुनिकधर्मा होने के आग्रह पहले थे और अपनी मानवधर्मिता को यह आधुनिकता से अलग नहीं देख सकते थे।”
- “सृजनशील प्रतिभा का धर्म है कि वह व्यक्तित्व ओढ़ती है। सृष्टियाँ लितनी भिन्न होती हैं सृष्टा उससे कुछ कम विशिष्ट नहीं होते, बल्कि उनके व्यक्तित्व की विशिष्टताएँ ही उनकी रचना में प्रतिबिंबित होती हैं।”
- “शिल्पाश्रयी काव्य पर रीति हावी हो सकती है, वैसे ही मताग्रही पर भी रीति हावी हो सकती है। “सप्तक” के कवियों के साथ ऐसा नहीं हुआ।
- “अब भी उनके बारे में उतनी ही सच्चाई के साथ कहा जा सकता है कि उनमें मतैक्य नहीं है, सभी महत्वपूर्ण विषयों पर उनकी राय अलग-अलग है – जीवन के विषय में, समाज धर्म और राजनीति के विषय में, काव्य-वस्तु और शैली के, छंद और तुक के, कवि के दायित्वों के – प्रत्येक विषय में उनका आपस में मतभेद है।”
- “दूसरा मूल सिद्धान्त यह था कि संगृहीत सभी कवि ऐसे होंगे जो कविता को प्रयोग का विषय मानते हैं – जो यह दावा नहीं करते कि काव्य का सत्य उन्होंने पा लिया है – केवल अन्वेषी ही अपने को मानते हैं।”
- “तारसप्तक” में सात कवि संगृहीत हैं। सातों एक-दूसरे से परिचित हैं – बिना इसके इस ढंग का सहयोग कैसे होता किंतु इससे यह परिणाम न निकाला जाए कि वे कविता के किसी एक “स्कूल” के कवि हैं। या कि साहित्य जगत के किसी गुट अथवा दल के सदस्य या समर्थक हैं।”
- “ऐसा होते हुए भी वे एकत्र संगृहीत हैं, इसका कारण काव्य के प्रति एक अन्वेषी का दृष्टिकोण उन्हें समानता के सूत्र में बाँधता है।”
- “इसका यह अभिप्राय नहीं है कि प्रस्तुत संग्रह की सब रचनाएँ रूढ़ि से अछूती हैं या कि केवल यही कवि प्रयोगशील हैं, बाकी सब घास छीलने वाले, वैसा दावा यहाँ कदापि नहीं, दावा केवल इतना है कि ये सातों अन्वेषी हैं।”
- “तारसप्तक की कविता वैसी जड़ाऊ नहीं है वह वैसी हो भी नहीं सकती।”
इतिहास साक्षी है कि “तारसप्तक” की इन स्थापनाओं पर बड़ा विवाद हुआ। नतीजा यह हुआ कि अज्ञेय ने “दूसरा सप्तक” में (भूमिका) पुनः अपनी बात की सफाई देते हुए कहाः
- “क्या ये रचनाएँ प्रयोगवादी हैं क्या ये कवि किसी एक दल के हैं, किसी मतवाद-राजनीतिक या साहित्यिक के पोषक हैं। “प्रयोगवाद” नाम के नए मतवाद के प्रवर्तन का दायित्व क्योंकि अनचाहे और अकारण ही हमारे मत्थे मढ़ दिया गया है।”
- “प्रयोग का कोई वाद नहीं है। हम वादी नहीं रहे, नहीं हैं। न प्रयोग अपने आप में इष्ट या साध्य है। ठीक इसी तरह कविता का कोई वाद नहीं है, कविता भी अपने आप इष्ट या साध्य नहीं है। अतः हमें “प्रयोगवादी” कहना उतना ही सार्थक या निरर्थक है जितना हमें “कवितावादी” कहना।”
- “जिस प्रकार कविता रूपी माध्यम को बरतते हुए आत्माभिव्यक्ति चाहने वाले कवि को यह अधिकार है कि उस माध्यम का अपनी आवश्यकता के अनुरूप श्रेष्ठ उपयोग करे, उसी प्रकार आत्म-सत्य के अन्वेषी कवि को अन्वेषण के प्रयोग-रूपी माध्यम का उपयोग करते समय उस माध्यम की विशेषताओं को भी परखने का अधिकार है।”
- “जो लोग प्रयोग की निन्दा करने के लिए परम्परा की दुहाई देते हैं, वे भूल जाते हैं कि परम्परा कम से कम कवि के लिए ऐसी कोई पोटली बाँधकर अलग रखी हुई चीज नहीं है जिसे वह । उठाकर सिर पर लाद ले और चल निकले। (कुछ आलोचकों के लिए भले ही वैसा हो) परम्परा का कवि के लिए कोई अर्थ नहीं है जब तक वह उसे ठोक बजाकर, तोड़-मरोड़कर देखकर आत्मसात् नहीं कर लेता, जब तक वह एक इतना गहरा संस्कार नहीं बन जाती कि उसका चेष्टापूर्वक ध्यान कर उसका निर्वाह करना अनावश्यक न हो जाए। अगर वह कवि की आत्माभिव्यक्ति एक संस्कार विशेष के वेष्टन में ही सामने आती है, तभी वह संस्कार देने वाली परम्परा, कवि की परम्परा है, नहीं तो वह इतिहास है, शास्त्र है, ज्ञान भण्डार है जिससे अपरिचित भी रहा नहीं जा सकता है।”
- “प्रयोग अपने आप में इष्ट नहीं है वह साधन है। और दोहरा साधन है। क्योंकि एक तो वह उस सत्य को जानने का साधन है जिसे कवि प्रेषित करता है, दूसरे वह उस प्रेषण की क्रिया को और उसके साधनों को जानने का भी साधन है। वस्तु और शिल्प दोनों के क्षेत्र में प्रयोग फलप्रद होता है।”
- “प्रयोग का हमारा कोई वाद नहीं है, इसको और भी स्पष्ट करने के लिए एक बात हम और कहें। प्रयोग निरंतर होते आए हैं और प्रयोगों के द्वारा ही कविता या कोई कला, कोई भी रचनात्मक कार्य आगे बढ़ सका है। जो यह कहता है कि मैंने जीवन भर कोई प्रयोग नहीं किया वह वास्तव में, यही कहना चाहता है कि मैंने जीवन-भर कोई रचनात्मक कार्य नहीं करना चाहा।”
- “केवल प्रयोगशीलता ही किसी रचना को काव्य नहीं बना देती। हमारे प्रयोग का पाठक या सहृदय के लिए कोई महत्त्व नहीं है, महत्त्व उस सत्य का है जो प्रयोग द्वारा हमें प्राप्त हो।”
- श्री नंददुलारे बाजपेयी का “प्रयोगवादी रचनाएँ” शीर्षक निबंध तर्क विकृति का आश्चर्यजनक उदाहरण है।
- “तारसप्तक” के कवियों पर यह आक्षेप किया जाता है कि साधारणीकरण का सिद्धान्त नहीं मानते। यह दोहरा अन्याय है। क्योंकि वे न केवल इस सिद्धान्त को मानते हैं, बल्कि इसी से प्रयोगों की आवश्यकता भी सिद्ध करते हैं। यह मानना होगा कि सभ्यता के विकास के साथ-साथ हमारी अनुभूतियों का क्षेत्र भी विकसित होता गया है और अनुभूतियों को व्यक्त करने के लिए हमारे उपकरण भी विकसित होते गए हैं। यह कहा जा सकता है कि हमारे मूल राग-विराग नहीं बदले – प्रेम अब भी प्रेम है, घृणा.., अब भी घृणा पर यह ध्यान में रखना होगा कि राग वही रहने पर भी रागात्मक संबंधों की प्रणालियाँ बदल गई हैं और कवि का क्षेत्र रागात्मक संबंधों का क्षेत्र होने के कारण इस परिवर्तन का कवि कर्म पर बहुत गहरा असर पड़ा है।”
- “जैसे-जैसे बाह्य वास्तविकता बदलती है वैसे-वैसे हमारे उससे रागात्मक संबंध जोड़ने की प्रणालियाँ भी बदलती हैं और अगर नहीं बदलती हैं तो उस बाहृय वास्तविकता से हमारा संबंध टूट जाता है।”
इस प्रकार, अज्ञेय के द्वारा ऊपर दिए गए सैद्धान्तिक वक्तव्य ही “प्रयोगवाद” के विचार केंद्र को आलोकित करते रहे। गिरिजाकुमार माथुर को छोड़कर “तारसप्तक” के सभी कवि साम्यवादी विचारधारा की ओर झुके रहे। मुक्तिबोध-“पूँजीवाद समाज के प्रति”, नेमिचन्द्र जैन-“कवि गाता है”, भारत भूषण अग्रवाल-“अपने कवि से” एवं “जागते रहो”, प्रभाकर माचवे-“निम्न मध्य वर्ग” और “बीसवीं सदी”, डा. रामविलास शर्मा-“विश्व शांति” शीर्षक कविताओं का स्वर स्पष्ट रूप से साम्यवादी विचारों से प्रेरित है। स्वयं अज्ञेय, जिन पर फायड का गहरा प्रभाव था – “जनगड़ान” कविता में “लाल आग मेरे भावी गौरव का पथ है” कहते मिलते हैं। इसलिए हिंदी आलोचकों का एक वर्ग-जगदीश गुप्त आदि – मानते हैं कि “प्रयोगवाद” का जन्म “प्रगतिवाद” की कोख से हुआ। लेकिन प्रगतिवादियों का मत है कि “प्रयोगवाद” का आंदोलन “प्रगतिवाद” की जन-चेतना के नाश के लिए सुनियोजित तरीके से चलाया गया। स्वयं डा. रामविलास शर्मा इसी मत की। पुष्टि करते हैं। “राही नहीं राहों के अन्वेषी” का नारा अज्ञेय ने सभी को सत्य से भटकाने के लिए दिया था – ताकि वे आभिजात्यवादी-पूँजीवादी मूल्यों की रक्षा कर सकें।
इतना ही नहीं, व्यक्ति स्वातंत्र्य के नाम पर अज्ञेय ने व्यक्तिवाद का पोषण किया और “कला कला के लिए” सिद्धान्त के बीज बोए। प्रयोगवाद की मूल प्रवृत्तियाँ टटोलकर पाया कि-
- विचारधारा से मुक्ति
- सत्य के अन्वेषण की झोंक
- व्यक्तिवाद
- बौद्धिकता का झूठा मुखौटा
- परम्परा की ऐतिहासिक चेतना
- प्रयोग का आग्रह
- चमत्कारी शिल्प में जड़ाऊ रूपवाद
- काव्य-भाषा और सम्प्रेषण
- नए बिम्ब और जटिल प्रतीक
- छंद और लय जीवन के भीतर से पकड़
- लोक लयों का उपयोग
वे सभी विशेषताएँ कविता के साहित्यिक मूल्यों तक सीमित हैं। मूलतः प्रयोगवादी काव्य-शिल्प की चमक-दमक का आंदोलन है जिस पर मनोविश्लेषणवाद, बिंबवाद, डी.एच. लारेन्स, टी.एस. एलियट आदि का प्रभाव है।
प्रयोगवाद से नई कविता के संबंध की पहचान
नयी कविता आंदोलन का “प्रयोगवाद” से निकट का रिश्ता है किंतु नयी कविता को प्रयोगवाद का पर्याय मानना गलत है। बहुत से लोग नयी कविता की शुरुआत 1943 ई. में अज्ञेय के सम्पादकत्व में निकलने वाले “तारसप्तक” से मानते हैं। ऐसे भी विद्वान हैं जो “नयी कविता” का आरंभ सुमित्रानन्दन पन्त और उनके “रूपाभ” (1938) से जोड़ते हैं और कुछेक सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला” के काव्य “कुकुरमुत्ता” (1942) के नवीन काव्य-बीजों में नई कविता के बीज खोजते हैं। यह भी कहा जाता है कि “सन् 1942-43 में पन्त, नरेन्द्र, केदार, शमशेर कविता की जिस धारा के कवि हैं, “तारसप्तक” उसमें प्रवाह की एक लहर है, नदी का स्थिर द्वीप नहीं।” (डॉ. रामविलास शर्मा, नई कविता और अस्तित्ववाद, पृ.17) शायद नयी कविता पचास वर्षों में सर्वाधिक विवादास्पद और विचारोत्तेजक साबित हुई है। कविता संबंधी चिंतन के अधिकांश विवाद के केन्द्र में किसी न किसी रूप में “तारसप्तक” ही है वर्षों तक “तारसप्तक” के “प्रयोग” और “अन्वेषण” पर करारी बहसें हुई, जिसका इस्तेमाल अज्ञेय ने भूमिका में किया था।
प्रयोग से “प्रयोगवाद” नाम चलाया गया और इस नाम पर तूफान खड़ा हो गया। अज्ञेय ने बार-बार कहा कि प्रयोग का कोई वाद नहीं है, हम वादी नहीं हैं, पर पुराने आचार्य भला कब मानने वाले थे। आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने इन प्रयोगशील कवियों को “प्रयोगवादी” कहा और इनका घोर विरोध किया, पर विरोध से अज्ञेय कब डरने वाले थे – अज्ञेय ने “दूसरा सप्तक” की भूमिका में आचार्यश्री के आक्षेपों का उत्तर दिया और पूरी काव्य-स्थिति को नए वैचारिक कोणों से स्पष्ट किया। वस्तुतः आगे चलकर प्रयोगवाद और प्रगतिवाद जिस नए काव्य-आंदोलन में घुल-मिल गए – “वह नयी कविता” है। और महीन-भेद उभरने पर दो तरह की “नयी कविता” हो गई – आधुनिकतावादी नयी कविता – प्रवर्तक अज्ञेय, दूसरी साम्यवादी-जनवादी-प्रगतिशील नयी कविता – प्रवर्तक गजानन माधव मुक्तिबोध।
शक और हिकारत की नज़र से देखे जाने पर भी छायावादोत्तर हिंदी कविता में “बौद्धिकता” की महत्त्व-प्रतिष्ठा “तारसप्तक” ने की। इन कवियों ने छायावाद के कल्पनाप्रवण, अमूर्त भाव-पद्धति-प्रधान, सूक्ष्मतावादी मनोवृत्ति, वायवीपन, रूढ़ होती पदावली को छोड़ने का जोखिम उठाया। प्रगतिवाद की स्थूल सतही एकांगी कविता पर प्रहार किया। बौद्धिकता की उठान से युक्त नई राह को खोजने की कोशिश “प्रयोगवाद” में पूरे जोर से की गई। हालाँकि नई राहें खोजने की तैयारी करने पर भी ये कवि एक सीमा से आगे नई राहें खोज नहीं पाए – यह अलग बात है। शानदार असफलता भी सफलता से कम कीमती चीज नहीं है – यह बात “प्रयोगवाद” ने सिद्ध करके दिखा दी। “तारसप्तक” के कवियों का बौद्धिक आचरण और काव्य-स्वभाव पहले की कविता से निश्चय ही भिन्न साबित हुआ ।
इसी दृश्य को समझते हुए नई कविता के आलोचक डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी को कहना पड़ा कि हिंदी में आधुनिकता की शुरुआत होती है – “तारसप्तक” से और हिंदी के पहले आधुनिक कवि का नाम है – अज्ञेय । (हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, पृ.226) “तारसप्तक” के प्रकाशन से हिंदी साहित्य में आधुनिक संवेदना का सूत्रपात माना जाता है। स्वाधीन पश्चिम और साम्यवादी रूस दोनों की विचारधाराएँ हिंदी साहित्य से सजग रूप में नियोजित आधुनिक काव्यांदोलन में परस्पर टकराती हैं – जिनके बीच ये सात कवि अपने निजी व्यक्तित्व की तलाश में गतिशील दिखते हैं। इस दृष्टि से “तारसप्तक” की भूमिका में उन्हें “राहों के अन्वेषी” ठीक ही कहा गया है।”
वैचारिक मतभेदों के होने पर भी “प्रयोग” का तत्व उन्हें एकसूत्रता में बाँध लेता है। इतना ही नहीं, विचारधारा के आग्रह से मुक्त इन कवियों की रचनात्मक संवेदनशीलता दूर तक इन्हें निर्मित करती है। प्रगतिवाद-प्रयोगवाद और नयी कविता के दौर घुल-मिलकर एक नया रचना-परिदृश्य उपस्थित कर देते हैं। इसलिए यह कहना ऐतिहासिक भूल है कि प्रयोगवाद का जन्म “प्रगतिवाद” की हत्या के लिए हुआ था।
वास्तविकता यह है कि “प्रयोगवाद” मानव जीवन के आंतरिक यथार्थ पर बल देने के कारण फ्रायड और जुंग की खोजों या स्थापनाओं की ओर प्रवृत्त हो गया। प्रगतिवादी काव्य ने यदि शोषित एवं बुभुक्षित के आक्रोश और असंतोष को अभिव्यक्ति दी तो “प्रयोगवाद” ने आधुनिक शिक्षा से सम्पन्न युवकों की अनास्था-यंत्रणा और संदेह की मनोदशाओं को व्यक्त किया। इसलिए प्रयोगवाद मानव-मन की निजी समस्याओं-चिंताओं का काव्य था। हिंदी कविता के विकास के सामने जो प्रश्न उपस्थित किए थे, प्रयोगवाद उन्हीं प्रश्नों के दायित्व को लेकर सामने आया था।” (डॉ. केदारनाथ सिंह, आधुनिक हिंदी कविता में बिंब-विधान, पृ० 297) सच बात तो यह है कि ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र का आधार “प्रयोग” पर टिका है, पर साहित्य के क्षेत्र में “प्रयोग” (एक्सपेरीमेण्ट) शब्द विज्ञान के क्षेत्र से न आकर “चित्रकला” के क्षेत्र से आया। यही स्थिति “अन्वेषण” शब्द की है। ये दोनों शब्द यूरोपीय चित्रकला में प्रसिद्ध होने के बाद साहित्य में आए।
आधुनिक कला के प्रवर्तक कलाकार सेजाँ ने “रिसर्च” शब्द का प्रयोग किया और वह चल निकला। सम्प्रेषणीयता की समस्या चित्रकला में भी थी और साहित्य में भी। इस दृष्टि से भी “अन्वेषण” प्रयोगवाद की मनोभूमिका में प्रवेश करता गया। आधुनिक अंग्रेजी कविता में टी.एस. इलियट और एजरा पाउण्ड “एण्टी-रोमांटिक” उठान लेकर आए। यहाँ तक कि पूरा “न्यू क्रिटिसिज्म” या नयी समीक्षा का आंदोलन रोमाण्टिक काव्य-मूल्यों के निषेध की पुकार लगाता आया । कुछ-कुछ ऐसी ही स्थिति हिंदी काव्य में भी दिखाई देती है – पूरा प्रयोगवाद और नयी कविता आंदोलन रोमाण्टिक मूल्यों के निषेध पर बल देता है। “तारसप्तक” के वक्तव्य अपनी गहराई में बिंबवादी ह्यूम, एजरा पाउण्ड और टी.एस. इलियट के काव्य-सिद्धान्तों की ध्वनियाँ लिये हुए दिखाई देते हैं।
प्रश्न उठता है कि प्रयोगवाद में “राहों के अन्वेषण” का क्या अर्थ है? इसका संभव उत्तर यही है कि कठिन होते कवि-कर्म की समस्या से जूझते हुए “संप्रेषणीयता” के मार्गों का अन्वेषण । अन्वेषण यह, कि राह शब्दों-बिंबों-प्रतीकों-लयों के बोध से निकाली जा सकती थी। इसीलिए ये सभी कवि शिल्प या रूप-विधान की ओर बढ़ते गए। इन कवियों की प्रयोगात्मक वृत्ति ने उन तमाम रूढ़ियों के विरूद्ध संघर्ष किया जो आधुनिक जीवन की गहन जटिल मनःस्थितियों-अनुभूतियों को मूर्त करने में बाधक हो रही थीं। शिल्प पर ज्यादा बल देने के कारण ही प्रयोगवाद को रूपवादी (फार्मलिस्ट) कहा जाता है। पर नयी कविता ने प्रयोगवाद के इस रूपवादी-चमत्कारवादी मोह से विद्रोह किया है। इसी दृष्टि से प्रयोगवाद तथा नयी कविता पर्याय नहीं हैं – दो भिन्न दृष्टि के काव्य-आंदोलन हैं।
नई कविता के नामकरण के नए अर्थ वृत्त
ऐतिहासिक दृष्टि से विचार करने पर यह तथ्य साफ उभर कर सामने आ जाता है कि सन् 1950 तक प्रयोग की एकान्तिक वृत्ति के प्रति आकर्षण कम हो गया। कविता अब चमत्कारवादी-रूपवादी रूढ़ियों के बंधनों को तोड़कर पूरे जीवन को सामने लाने का संघर्ष करने लगी तो उसके लिए एक नए नाम की जरूरत महसूस की गई। सर्वप्रथम अज्ञेय जी ने इस काव्य-प्रवृति को “नयी कविता” नाम (आज का भारतीय साहित्य,) देने का प्रस्ताव किया। संयोगवश यह नाम चल निकला और नई प्रवृत्तियों के लिए रूढ़ हो गया।
इलाहाबाद से 1954 में “नयी कविता” पत्रिका आरंभ हुई। “नयी कविता” के प्रकाशन से यह नाम चर्चित होकर पूरे प्रवाह में आ गया। इलाहाबाद के नए रचनाकार और आलोचक धर्मवीर भारती, रधुवंश तथा विजयदेव नारायण साही “आलोचना” त्रैमासिक के सम्पादकत्व मण्डल में थे- एक विचार-गोष्ठी में इन सभी ने नई सर्जनात्मक संवेदना पर पाठकों का ध्यान केंद्रित करने के लिए “नयी कविता” पत्रिका । निकालने का निर्णय लिया । सम्पादन का दायित्व जगदीश गुप्त (नयी कविता आंदोलन के कवि आलोचक) तथा डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी (नए साहित्य – नव लेखन के प्रख्यात आलोचक) को सौंपा गया। इलाहाबाद में “नयी कविता” पर गरमागरम बहसें हो रही थीं। अतः एक काव्य-आंदोलन के रूप में “नयी कविता” का प्रकाशन स्वाभाविक ही था। “नयी कविता” के सन् 1954 से 1967 तक आठ अंक प्रकाशित हुए जिनमें लक्ष्मीकांत वर्मा, सर्वेश्वर, कुँवर नारायण, विपिन कुमार अग्रवाल, श्रीराम वर्मा आदि की कविताएँ तथा अज्ञेय, रघुवंश, विजयदेवनारायण साही, जगदीश गुप्त, रामस्वरूप चतुर्वेदी जैसे काव्य-मर्मज्ञों की टिप्पणियाँ और लेख प्रकाशित हुए।
भारती की “कनुप्रिया” तथा “अंधायुग” जैसी रचनाओं के अंश भी “नयी कविता” में प्रकाशित हुए तथा आधुनिक संवेदना की अभिव्यक्ति में प्राचीन पौराणिक मिथकों-आख्यानों के सफल-सार्थक प्रयोग की संभावनाओं पर भरोसा किया गया। पत्रिका के “संचयन स्तम्भ” में अनेक परिचित अपरिचित नए रचनाकर छापे गए – बहुत सी नई प्रतिभाएँ “नयी कविता” पत्रिका से प्रकाश में आईं। “नयी कविता” पत्रिका के कुछ लेख “लघु मानव के बहाने हिंदी कविता पर एक बहस” (साही जी), “अर्थ की लय” तथा “रसानुभूति और सह-अनुभूति” बहुत प्रसिद्ध हुए। इनमें । “बिंब-विधान”, “आधुनिकता”, “विचारधारा” पर करारी बहसें हुई। प्रभाकर माचवे ने “भारतीय भाषाओं में नयी कविता : कुछ नोट्स” “नयी कविता” के अंकों में लिखे। इन सबसे “नयी कविता” पर विचार-चिंतन का वातावरण बना।
सन् 1953 में नए लेखकों की संस्था “परिमल” ने “नयी कविता” पर विचार-गोष्ठियों का आयोजन किया। भारतभूषण अग्रवाल, जगदीश गुप्त तथा रामस्वरूप चतुर्वेदी ने “नयी कविता” पर पर्चे पढ़े। शमशेर की लम्बी कविता “अमन का राग” पढ़ी गई तो पाठकों में व्यापक प्रतिक्रिया हुई। “नए पत्ते”, “निकष”, “प्रतिमान” जैसी पत्रिकाएँ “परिमल” वृत्त के लेखकों ने निकाली। “परिमल” की गोष्ठियों के संयोजन का कार्य लक्ष्मीकांत वर्मा, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, हरदेव बाहरी तथा हरिमोहन दास टंडन ने किया। “प्रतिमान” पत्रिका विज्ञापित हुई पर प्रकाशित नहीं हो पाई। फलतः डॉ. रघुवंश ने “क ख ग” त्रैमासिक का प्रकाशन किया, जिसके पन्द्रह अंक निकले और नए साहित्य को इस लघु पत्रिका ने अनेक नए पाठक दिए। “परिमल” नाम में निराला के प्रति नमन और आकर्षण दोनों थे।
डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने लिखा है, “निराला इन नए लेखकों के मन में कैसे बसे थे – इसका रोचक साक्ष्य इस तथ्य से मिलता है कि उनकी गोष्ठी का नामकरण कवि के आरंभिक संकलन के आधार पर “परिमल” हुआ। “नयी कविता” नाम अज्ञेय का ही दिया हुआ है।” (हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, पृ. 276) इस रचनात्मक माहौल से “नयी कविता” शब्द का अर्थ व्यापक से व्यापकतर होता गया और इस रचना-युग को “नयी कविता युग”, “नवलेखन युग’ नाम भी सुझाया गया। कविता केन्द्र में तो रही पर नयी समीक्षा तथा नए सृजन में (नाटक-उपन्यास-कहानी) सभी गद्य-रूप नए रूपों में अभिव्यक्त हुए।
“नयी कविता” आंदोलन को प्रतिष्ठित करने में अज्ञेय की भूमिका अविस्मरणीय है। सन् 1951 में सच्चिदानंद हीरानंद वात्यायन अज्ञेय ने “दूसरा सप्तक” निकाला। “दूसरा सप्तक” नयी कविता का बेजोड़ दस्तावेज है। इसमें भवानी प्रसाद मिश्र, शकुन्त माथुर, हरिनारायण व्यास, शमशेर बहादुर सिंह, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय तथा धर्मवीर भारती मौजूद हैं। “तीसरा सप्तक” (1959) इसी नयी कविता चेतना का विस्तार कहा जा सकता है जिसमें प्रयाग नारायण त्रिपाठी, कीर्ति चौधरी, मदन वात्स्यायन, केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण, विजयदेवनारायण साही, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना को स्थान मिला है।
“तीसरा सप्तक” के अन्तिम चार कवियों ने नयी कविता को हर दृष्टि से सम्पन्न बनाया लेकिन आरंभ के तीन कवि अपने कृतित्व में निरंतर पिछड़ते गए और नाममात्र शेष रह गए। लेकिन नयी कविता आंदोलन सप्तकों तक सीमित नहीं रहा – इसमें अनेक उल्लेखनीय कवि स्वतंत्र रूप से आए। यहाँ इन सभी कवियों की सूची प्रस्तुत करना न तो संभव है और न उचित ही। कुछ उल्लेखनीय कवियों के नाम इस प्रकार हैं – लक्ष्मीकांत वर्मा, जगदीश गुप्त, वीरेन्द्र कुमार जैन, श्रीकांत वर्मा, विपिन कुमार अग्रवाल, अजित कुमार, रामदरश मिश्र, श्रीराम वर्मा, बालकृष्ण राव, दुष्यंत कुमार, कैलाश वाजपेयी, शिवचन्द्र शर्मा, अशोक वाजपेयी आदि। ऐसा भी नहीं है कि नयी कविता आंदोलन केवल छोटी और लम्बी कविताओं के भीतर ही पनपता रहा है – उसने प्रबंध काव्य के क्षेत्र में भी पहल की। नयी प्रबंध-चेतना की दृष्टि से “चिन्ता” (अज्ञेय), “अंधायुग”, “कनुप्रिया” (धर्मवीर भारती), “आत्मजयी” (कुँवर नारायण). “एक कंठ । विषपायी” (दुष्यंत कुमार), “चित्रकूट चरित” (लक्ष्मीकांत वर्मा) उल्लेखनीय हैं। नयी कविता युग में पनपने वाली मूल्यांधता, मोहभंग की स्थिति को इस प्रबंध चेतना ने विस्तार से प्रस्तुत किया और इस युग की पूरी मनोभूमिका (यंत्रणा-संत्रास-अनास्था) को नए बिंबों-प्रतीकों में अभिव्यक्ति दी।
नयी कविता आंदोलन की विशिष्टताओं, विविध रूपों, विचारों तथा प्रवृत्तियों का विस्तार से विवेचन-विश्लेषण करने वाली पत्रिकाओं पर भी हमारा ध्यान जाता है। उनमें “नयी धारा”, “भारती”, “लहर”, “प्रतीक”, “नया प्रतीक”, “ज्ञानोदय”, “नया खून”, “कल्पना”, “माध्यम”, “आधार”, “उत्कर्ष”, “कृति”, “क ख ग”, “निकष”, “कृति परिचय”, “युयुत्सा”, “अर्थ”, “संज्ञा”, “आलोचना”, “धर्मयुग” आदि का स्मरण हो आना स्वाभाविक है। यहाँ तक कि लगभग प्रत्येक रेडियो केन्द्र से किसी न किसी रूप में नयी कविता पर वार्तामालाएँ अथवा परिसंवाद प्रसारित किए गए। शायद छायावादी कविता के आरंभिक युग के बाद से कविता को इतना महत्त्व कभी नहीं मिला।
यह संयोग नहीं है कि अज्ञेय-मुक्तिबोधगिरिजाकुमार माथुर, धर्मवीर भारती, साही, शमशेर और रघुवीर सहाय के विचार केन्द्र में “नयी कविता” ही रही है। इसका कारण है अपने युग की पूरी मनोभूमिका को नयी कविता ने नए काव्यात्मक मुहावरे में सर्वाधिक सशक्त अभिव्यक्ति दी। नयी कविता में जो तनाव-घिराव, हर्ष-विषाद, द्वन्द्व और विरोधाभास हैवह अपने “परिवेश” की सीधी आवाज की उपज है। फलतः नयी कविता के विचारों-मूल्यों-मानदण्डों, उसकी विषय-वस्तु और रूप से पाठक सहमत हो या असहमत पर उस पर सोचने के लिए विवश है। आधुनिक संवेदना के अपार विस्तार और केन्द्र में मौजूद मानव, समस्याओं-चिंताओं-प्रश्नाकुलताओं और यंत्रणाओं के बारे में नयी कविता नए तर्क पैदा करती है।
ऐसी स्थिति के कारण “नयी कविता” को न तो शास्त्रीय ढंग से परिभाषित किया जा सकता है न विश्लेषित। हालाँकि नयी कविता का शास्त्र लक्ष्मीकांत वर्मा ने “नयी कविता के प्रतिमान”, “नए प्रतिमान पुराने निकष”, डॉ. नामवर सिंह ने “कविता के नए प्रतिमान”, गिरिजा कुमार माथुर ने “नयी कविता : सीमाएँ और संभावनाएँ” लिखकर बनाने की कोशिश की। पर हुआ क्या? कोई भी कवि-आलोचक या आलोचक उसके विस्तार को न तो बाँध सका न उसकी गहराई ही बता सका। केवल व्यापक संकेतों से ही नयी कविता के विस्तार को समझा जा सकता है।
भाव-बोध
प्रयोगवाद और नयी कविता के लगभग सभी कवियों के प्रेरणा केन्द्र सूर्यकांत त्रिपाठी निराला रहे हैं। अज्ञेय “तारसप्तक” की प्रति निराला के पास भेजते हैं – निराला जी तत्काल “तारसप्तक” के सहयोगी कवि रामविलास शर्मा को पत्र लिखते हैं, – “कल ‘तारसप्तक’ संग्रह मिला। अच्छा निकला है। इन रचनाओं का रूप मेरी दृष्टि से निखर रहा है।” निराला की प्रसन्नता के अनेक अर्थ किए जा सकते हैं। प्रगति-प्रयोग से फूटती “आधुनिक संवेदना” की धारा में कहीं न कहीं निराला अपनी विजय देखते हैं – अपनी प्रयोगशीलता की विजय । प्रयोगवाद और नयी कविता के भाव-बोध को हम इतिहास की इस प्रक्रिया में समझ सकते हैं कि आधुनिक चिंतन में निरंतर बदलता हुआ मनुष्य और समग्र मनुष्य की अवधारणा ही सारे उपक्रम का आधार है। द्वितीय विश्व युद्धोत्तर संसार की केन्द्रीय चिंता रही है – मानवीय मूल्यों का विघटन और अनास्था-यंत्रणा-पीड़ा की असहनीय स्थितियों से साक्षात्कार । यह तीखा अहसास कि मूल्यों की सर्जनात्मकता के आधार जैसे टूट-फूटकर “वेस्टलैण्ड में बिखर गए हैं – बाँझ ऊसर का निपट अकेलापन। इस स्थिति को लाने में साम्राज्यवादी और विज्ञान की प्रविधि ने भूमिका अदा की है – धर्म, परिवार, नैतिकता, परम्परागत मूल्य सभी को विज्ञान ने लील लिया है। फिर महाशक्तियों ने शीत-युद्ध छेड़ दिया है। मानव पर संकटकालीन बादल और तेजी से छा रहे हैं। विज्ञान-टेक्नोलॉजी से जीवन की ऊपरी गति बढ़ी है पर मानव के भीतर का धर्म और ईश्वर मर गया है। प्रकृति और इतिहास के अलगाव से आत्मनिर्वासन, अकेलापन, ऊब, अंधकार, निराशा पैदा हुई है।
विज्ञान की प्रविधियों से गति इतनी बढ़ गयी है कि सभी मानवीय संबंध डगमगा गए हैं और प्रेम, सेक्स, धर्म, आचरण – सभी मर्यादाएँ नष्ट हो गई हैं। धर्मवीर भारती ने “अंधायुग” में इसी टूटन की पीड़ा को बृहत्तर मानवीय संदर्भो में अभिव्यक्ति दी है – मूल्यांधता का युग -अंधायुग – “हम सबके मन में गहरा उतर गया है युग / अश्वत्थामा है संजय है – अंधियारा / है दास वृत्ति, उन दोनों वृद्ध प्रहरियों की / अंधा संशय है / लज्जाजनक पराजय है। जहाँ आदमी आदमी को चीर-फाड़कर खुश है – संस्कृति नदी उदास-विकृत “नदी वधू की नथ का मोती चील ले गई” (समय देवता – नरेश मेहता) माँस-लोभी चील-कौए-गिद्ध जीवन पर मंडराने लगे – मानव का उपजाया सूरज ही उसे निगल गया। समय का रथी चक्रव्यूह में फंसकर हाँफ रहा है, विवशता-असहायता परिवेश में तन गई है। यंत्र दानव के प्रचार-प्रसार ने सम्प्रेषण की सहज प्रकृत गतियों को घेरकर अर्थहीन कर दिया है। प्रकृति, मनुष्य, ।
इतिहास और यंत्र के बीच जो रिश्ता बना है, अवमानवीकरण अपराधीकरण, अप-संस्कृति उसी की देन है। नए संसार की इसी कुशल समस्या से प्रयोगवाद-नयी कविता के कवि जूझते रहे हैं। गजानन माधव मुक्तिबोध के शब्दों में ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान की संश्लिष्टता से निर्मित नयी कविता मूलभूत संवेदनशक्ति में विलक्षण प्रवृत्ति अपनाती है। यह पूरी कविता कुछ अपवादों को छोड़कर परिवेश के साथ द्वन्द्व-स्थिति में है।
प्रश्न उठता है कि आधुनिक भाव-बोध क्या है? मुक्तिबोध के मत से “मैं अपनी खुद की जिन्दगी और दोस्तों की जिन्दगी से बता सकता हूँ कि अन्याय के विरुद्ध आवाज बुलंद करना आधुनिक भाव-बोध के अंतर्गत है। आधुनिक भाव-बोध के अंतर्गत यह भी आता है कि मानवता के भविष्य निर्माण के संघर्ष में हम और भी अधिक दत्तचित्त हों, तथा हम वर्तमान परिस्थिति को सुधारें, नैतिक हास को थामें – उत्पीड़ित मनुष्य के साथ एकात्म होकर उसकी मुक्ति की योजना करें।” अंततः अनुभूति की ईमानदारी और प्रामाणिकता ही उसके जीवन जगत के सौंदर्यानुभूति को शक्ति देती है। “कविता में कहाँ कितना फ्राड होता है, यह मैं जानता हूँ। फ्राड को आप कौशल भी कह सकते हैं। नयी कविता का कवि बहुत सचेत है, वह काफी फ्राड करता है।” सच बात यह है कि पुराने कवियों की तरह प्रयोगवादी तथा नयी कविता के कवियों के पास कोई सर्वांगीण दार्शनिक विचारधारा नहीं है, किंतु वह अपने जीवन की वास्तविकता के संपर्क में तो है।
नया कवि आज की विषम-सभ्यता के भयानक दृश्यों-कष्टों-वेदनाओं की अभिव्यक्ति करता है – अनुभव वृद्धि के साथ ही वह सौंदर्याभिरुचि का विस्तार और पुनः-पुनः संस्कार करता है। कारण, उसके लिए काव्य रचना केवल व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया नहीं है – वह एक सांस्कृतिक प्रक्रिया है। इसलिए मूल्य चेतना व्यक्ति की देन न होकर पूरे समाज की देन है। फलतः नयी कविता का भाव-बोध एकान्त का एकालाप नहीं है, समाज से मानव से सीधा “वार्तालाप” है, एक ऐसा वार्तालाप जिसमें भावनात्मक और बौद्धिक परिष्करण की संस्कृति को व्यापक स्वीकृति प्राप्त है। जीवन की विविधता के कारण नयी कविता में कहीं गीत का स्वर है, कहीं आलोचना का स्वर, कहीं रमणीय प्रकृति की अनुभूति का स्वर है तो कहीं आत्मालोचन का रंग। “सच तो यह है कि नयी कविता के भीतर कई स्वर हैं, कई शैलियाँ हैं, कई शिल्प हैं और कई भाव-पद्धतियाँ। नयी कविता एक काव्य प्रकार का नाम है।
उस काव्य प्रकार के भीतर अनेकानेक व्यक्तिगत शैलियाँ, शिल्प, रचना-विधान और जीवन-दृष्टियाँ हैं।” (नयी कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध पृष्ठ 3) किंतु छायावाद-प्रगतिवाद की तरह कोई आध्यात्मिक-भौतिक दार्शनिक विचारधारा उसके भाव-बोध में भिदी हुई नहीं है। अज्ञेय के शब्दों में, नयी कविता सबसे पहले एक “नयी मनःस्थिति का प्रतिबिंब है – एक नए मूड का – एक नए राग संबंध का रूप है।”
प्रमुख प्रवृत्तियाँ
प्रगतिवाद और नयी कविता एक ओर तो द्वितीय विश्व युद्ध की भयावह चेतना से दूसरी ओर स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद के परिवेश से प्रभावित और आंदोलित रही है। अस्तित्ववाद-आधुनिकतावाद मार्क्सवाद और गांधी-लोहियावाद के विचारों ने इन रचनाकारों में एक ऐसी अंतर्दृष्टि उत्पन्न की है जो जीवन-जगत के गतिशील और जटिल यथार्थ को नए कोणों से अभिव्यक्ति देती है। मनोविश्लेषणशास्त्र और अस्तित्ववाद के प्रभाव-दबाव ने मानव की निराशा-पराजय-मृत्युबोध को रचना में ढाला है। मध्य वर्ग की आशाओं-आकांक्षाओं ने काव्य-सृजन में शहरीकरण से उत्पन्न समस्याओं के साथ संस्कृति तथा परम्परा के भीतर से निकली आधुनिकता-बोध की प्रक्रिया और व्यक्ति के आत्म-निर्वासन की पीड़ा को तीव्र किया है। पुराने मूल्यों के मोह भंग ने इस कविता में राजनीति और व्यवस्था के मानवद्रोही चरित्र को व्यंग्य-वक्रोक्ति, विसंगति और विडम्बना की काव्य-भाषा में इस ढंग से उजागर किया है कि पूरे परिवेश की समझ पैदा होती है। इस काव्य-धारा की प्रमुख विशेषताओं या प्रवृत्तियों को इस प्रकार निरूपित किया जा सकता है :
सारांश
इस इकाई में आपने प्रयोगवाद और नयी कविता के विषय में अध्ययन किया। आपने देखा प्रयोगवादी कविता के कवियों ने अपने पूर्ववर्ती कवियों से एक अलग प्रकार की मनोभूमि को निर्मित किया। “तारसप्तक” प्रयोगवादी काव्य की मनोभूमि को प्रतिनिधित्व करने वाला काव्य संग्रह है। ‘अज्ञेय’ कविता को केवल प्रयोग के रूप में प्रस्तावित करना चाहते थे, लेकिन आलोचकों ने उसे प्रयोगवाद बना दिया। किसी भी साहित्यिक धारा की तरह प्रयोगवाद में अंतर्विरोध की स्थिति उत्पन्न हुई थी। नकेनवादी उसी अंतर्विरोध का जीवित प्रमाण था। सभी प्रयोगवादी कवि इस बिंदु पर सहमत थे कि ‘वे राही नहीं राहों के अन्वेषी हैं।”
प्रयोगवाद के चमत्कारी रूपवाद से कविता को मुक्त करने का प्रयास होने लगा। नयी कविता उसी चमत्कारी रूपवाद से मुक्ति का स्वप्न है। ‘नयी कविता’ का क्षेत्र प्रयोगवाद की अपेक्षा अधिक व्यापक और गहरा था। नयी कविता में कई तरह की विचारधाराओं का समन्वय हुआ। परस्पर विपरीत विचारधारा के कवि भी नयी कविता के अंतर्गत अपनी काव्य रचना करते रहे। नयी कविता के प्रतिनिधि कवि अज्ञेय और मुक्तिबोध थे। नयी कविता की स्थापनाओं को प्रतिपादित करने के लिए समय-समय पर साहित्यिक संस्था और साहित्यिक पत्रिका को प्रस्तावित किया गया था।
प्रयोगवाद और नयी कविता की काव्य प्रवृति भी अलग-अलग हैं। काव्य प्रवृति में कुछ कवियों ने गैर-रोमान्टिक प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया तो कुछ कवियों ने रोमानी प्रवृत्ति को नए अंदाज में अभिव्यक्त करने का प्रयास किया । व्यक्तिवादी और समाजवादी दोनों प्रकार के चिंतन से कविता की काव्यानुभूति को निर्मित किया गया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की विडम्बना, घुटन और विसंगति को नयी कविता में देखा जा सकता है। अस्तित्ववाद की धीमी लहर को भी नयी कविता में रेखांकित किया जा सकता है। तमाम सीमाओं के बावजूद नयी कविता ने अनुभूति की ईमानदारी को प्रामाणिक रूप से रचने का संकल्प नहीं छोड़ा। शिल्प के धरातल पर जितने प्रकार के प्रयोग नयी कविता में हुए हैं शायद ही किसी साहित्यिक आंदोलन में हुए होंगे।
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